श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 19
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 19
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं।
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श्रीमद्भागवद्गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक संख्या 54 से 61 तक में श्रीकृष्ण ने उस व्यक्ति की विशेषताओं का वर्णन किया है जिसे स्थितप्रज्ञ अर्थात REALIZED MASTER कहा जाता है अर्थात जिसने सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। अब एक बार पुनः उसी व्यक्ति को यँहा पंडित कह कर सम्बोधित किया गया है और बताया गया है कि इस पंडित व्यक्ति की विशेषताएँ क्या हैं। दरअसल श्रीकृष्ण बार बार ये समझाने की चेष्टा कर रहें हैं कि कर्मयोग के रास्ते चलकर हमें किस तरह के व्यक्ति के रूप में विकसित होने की कोशिश करनी है। सो हम पुनः समझें कि कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए हमें किस तरह से विकसित होने की जरूरत है और किस तरह के व्यक्ति बनने की आवश्यकता है। दरअसल हमारा लक्ष्य इसी तरह के व्यक्ति के रूप में विकसित होना है जिसे यँहा पण्डित कह कर सम्बोधित किया गया है। हम क्रम से इस पण्डित व्यक्ति की विशेषताओं को देखते हैं।
1. कामना और संकल्प का अभाव
पहली विशेषता है कि इस तरह के व्यक्ति की कामनाएँ समाप्त हो चुकी होती हैं। इस तरह का व्यक्ति सब कुछ करते हुए भी प्रकृति के गुणों और खुद की स्वार्थपरक इक्षाओं से उत्पन्न कामनाओं से मुक्त हुआ रहता है। वह सब कुछ करता है लेकिन उसके कर्म उसकी अपनी किसी भी कामना और इक्षा से संचालित नहीं होते बल्कि उसे जो ज्ञान प्राप्त है कि उसका सेल्फ क्या है उसी से वह संचालित होता है। ऐसा व्यक्ति कारण और प्रभाव के वश में आकर कर्म नहीं करता है। उसे तो अपनी वस्त्विकता की जानकारी हो चुकी होती है , उसे ज्ञात है कि उसकी वस्त्विकता प्रकृति से निर्धारित नहीं है, किसी भी बाहरी कारक से उसका सेल्फ प्रभावित नहीं होने वाला है, सो वह मन , बुद्धि और शरीर से सब करता हुआ भी उनसे बंध कर कुछ नहीं करता है क्योंकि उसकी अपनी कोई कामना ही नही है। सो उसके कर्म तो उसके ज्ञान रूपी अग्नि से भस्म हो जाते हैं, उससे बन्ध कर नहीं रहते हैं।
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