श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 17

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है।
 ॥17॥
हमने अभी अभी देखा -समझा है कि व्यक्ति का जीवन उसके द्वारा किये जा रहे कर्मों से ही निर्धारित होता है सो ये आवश्यक है कि हम सभी कर्मों को भली भाँति समझें ताकि हम समझ सकें कि हमें कौन सा कर्म करना है, और कौन नहीं और उन्हें कैसे करना है। इस सम्बंध में श्रीकृष्ण तीन तरह के कर्मों की चर्चा करते हैं
1.कर्म
2.अकर्म
3.विकर्म
हम यथा स्थान इनकी चर्चा भी सुनेंगे-समझेंगे।

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