श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 10
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 10
वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं
॥10॥
अवतार की समझ और मोक्ष की प्राप्ति कोई काल्पनिक वस्तु नहीं होती, बल्कि एक व्यवहारिक ज्ञान है जिसकी समझ पाकर व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। श्रीकृष्ण जब अर्जुन को योग की शिक्षा दे रहें हैं तो उसे यह भी बताते हैं कि ये ज्ञान पहली बार उजागर नहीं हो रहा है बल्कि यह तो सृष्टि के प्रारम्भ से ही व्यक्ति और समाज का दिशा निर्देशन करता रहा है। अब पुनः बताते हैं कि इस योग ज्ञान से बहुतों ने अंतिम लक्ष्य यानी ईश्वर को प्राप्त किया है। तब स्वाभाविक रूप से ये जिज्ञासा होती है कि ऐसे लोग कौन थे। आप द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए सिद्ध पुरुष की विशेषताओं को स्मरण करेंगे तो बातें साफ हो जाएंगी। योगमार्ग पर चलने की पहली शर्त है कि व्यक्ति राग से यानी लगाव(ATTACHMENT) से मुक्त हो क्योंकि इसी वजह से व्यक्ति के अंदर भय और क्रोध का जन्म होता है। राग है तो उसके साथ भय भी है और क्रोध भी है जो व्यक्ति के विवेक को समाप्त कर देता है।
जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है। और उसके खोने की कल्पना भी बराबर साथ लगी रहती है जिससे भय भी बराबर लगा होता है।
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
जब व्यक्ती इस अत्यधिक लगाव की भावना से मुक्त होता है तो वह भय और क्रोध से भी मुक्त होता है। सो भय और क्रोध से बचने का मार्ग ये है कि सबसे पहले लगाव से बचे। और ये तभी सम्भव होता है जब व्यक्ति की प्राथमिकता स्व से आत्मसाक्षात्कार होती है। ध्यान रहे आत्मसाक्षात्कार का मार्ग पलायन का मार्ग कदापि नहीं है। ऐसा प्रचार अज्ञानी ही करते हैं जो ईश्वर की खोज पहाड़ों और गुफाओं में करते हैं। एकांत कल्याण का मार्ग नहीं होता बल्कि वही पलायन का मार्ग है। द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण कर्म करने की महत्ता को विस्तार से समझा चुके हैं। और ये भी बता चुके हैं कि योग का मार्ग तभी मिलता है जब लगाव से मुक्ति मिल जाती है। तब व्यक्ति निष्काम कर्म के रास्ते चलकर जिस अवस्था में परिणाम की चिंता से मुक्त होकर कर्म करने लगता है तब उस ज्ञान की समझ से परिपूर्ण होता है जिससे उसे सेल्फ यानी अपनी आत्मा की उपस्थिति का भान होता है। यही वह स्थिति है जब व्यक्ति के लिए ईश्वर कोई कौतूहल न होकर उसके इष्ट ,मित्र, मार्गदर्शक हो जाते हैं और उस व्यक्ति के लिए कण कण में दिखने लगते हैं। तब वह व्यक्ति सभी में अपना गई रूप देखता है और सभी को खुद में देखता है।
इस अवस्था को कर्म के रास्ते प्राप्त ज्ञान से होता है। ज्ञान की साधना कर्म में निहित होती है। इस मार्ग के क्रमिक पड़ाव होते हैं-
इस मार्ग से चलकर ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान से विषय की समझदारी आती है। जो कुछ हम सुनते हैं, अनुभव करते हैं , यदि उसपर मनन चिंतन करते हैं तो उस विषय की समझदारी भी आती है। तब हम उसको व्यवहार रूप में लाने का अभ्यास करते हैं तो उसे आत्मसात कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में शंकाएँ दूर हो जाती हैं। यही अवस्था होती है जब व्यक्ति आत्मसाक्षात्कर कर लेता है। तब व्यक्ति कर्तापन के बोझ से मुक्त होकर कर्म करता है। यही मोक्ष की स्थिति होती है। और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये स्थिति सभी को नहीं मिल जाती। इसके लिए व्यक्ति को अपना पूर्वाग्रह त्याग कर अहंकार रहित होना होता है क्योंकि तभी वह इसके पात्र हो पाता है। श्रीकृष्ण के शरणागत होने का तात्पर्य यही है कि यदि आप उपरोक्त स्थिति को पाना चाहते हैं तो पहले उस स्थिति की श्रेष्ठता को मानना होगा। यदि आपके मन में इस अवस्था के प्रति थोड़ा भी शक संदेह है तो फिर आप उस मार्ग पर पूरे मनोयोग से चलेंगे ही नहीं और जब चलेंगे नहीं तो पहुँचेगे भला कैसे।
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