श्रीमद्भागवद्गीता चतुर्थ अध्याय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भागवद्गीता चतुर्थ अध्याय पृष्ठभूमि

हम कौन हैं, हमारा क्या लक्ष्य है, उस लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है, ये वो प्रश्न हैं जिनका सामाधान हम सभी खोजते हैं और इसी समाधान का सार्थक प्रयास है श्रीमद्भागवद्गीता के ज्ञान का प्रशिक्षण।  प्रथम अध्याय में हमारे अविवेक को दिखलाया गया है। शैक्षणिक स्तर पर हम विद्वान होने के वावजूद इस बात की कोई गारन्टी नहीं होती है कि हम उन तीन मौलिक प्रश्नों का उत्तर जाने हीं, कि (1) हम कौन हैं? (2).हमारा लक्ष्य क्या है? और (3) इस लक्ष्य को पाना कैसे है?
द्वितीय अध्याय में इन प्रश्नों का सारांशतः उत्तर बताया गया है जिसमें लोकप्रचलन, आत्मा, ज्ञान , कर्म और एनलाइटनमेंट यानी सिद्धि  की जानकारी दी गई है। किंतु सत्य ये है कि मनुष्य होने के नाते हम किसी व्यक्ति के द्वारा बताई बातों पर सहजन्ता से भरोसा न कर उनका परीक्षण और प्रतिपरीक्षण करते हैं और परीक्षण और प्रतिपरीक्षण करने का माध्यम प्रश्न करना होता है। साथ ही हम हमेशा सबसे सहज रास्ता का चुनाव करना चाहते हैं लेकिन इस क्रम में भूल जाते हैं कि विकास क्रमिक प्रगति है न कि रैंडम। सो तृतीय अध्याय में इन तीन प्रश्नों के उत्तर का मार्ग कर्मयोग के माध्यम से बताया गया है जिसके अंत में हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है।
       गीताकार ने युद्ध की पृष्ठभूमि में इन तीन प्रश्नों को उठाया है और युद्ध की पृष्ठभूमि में ही इनका उत्तर भी तलाशा है। इसका कारण ये है कि इन तीन प्रश्नों की उत्पत्ति ही द्वंद्व का परिणाम है। द्वंद्व न हो तो आगे बढ़ने, प्रश्न पूछने और उत्तर पाने की लालसा ही न रहे। द्वंद्व का अंत जानकारी का अभाव होता है। जब तक ज्ञान अप्राप्त रहता है मन में द्वंद्व लगा रहता है, सो श्रीमद्भागवद्गीता की पृष्ठभूमि में युद्ध यानी द्वंद्व है। 
  दूसरी बात कि श्रीमद्भागवद्गीता अर्जुन और श्रीकृष्ण के प्रश्नोत्तरी संवाद के रूप में प्रस्तुत है क्योंकि द्वंद्व से प्रश्न उपजते हैं जिनका निदान द्वंद्व की समाप्ति कर देता है। प्रथम अध्याय में इस द्वंद्व को अर्जुन के विषाद के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है, तो द्वितीय अध्याय में इस द्वंद्व का उत्तर लोकाचार, आत्मा यानी सेल्फ के ज्ञान, कर्मयोग , ज्ञानयोग और सिद्धि प्राप्ति के सम्बंध में श्रीकृष्ण के द्वारा दिये ज्ञान से बताया गया है। लेकिन व्यक्ति यानी अर्जुन यानी हम सभी प्राप्त होने वाले ज्ञान का उतना ही अंश प्राप्त कर पाते हैं जितना हमारे पूर्व संचित ज्ञान के पूर्वाग्रह अनुमति देते हैं। सो श्रीकृष्ण की बताई सभी बातें अर्जुन यानी हम सभी के पल्ले नहीं पड़ती और सबसे अधिक सहजता हमें सीधे अंत को प्राप्त कर लेना लगता है। तब श्रीकृष्ण तृतीय अध्याय में क्रम से मार्ग को बताते हैं जिसके अनुसार वे सबसे पहले निष्काम कर्मयोग को तृतीय अध्याय में फिर से समझाते हैं। कर्म करने की विधि बताते हैं और उसमें बरती जाने वाली सावधानियों को समझाते हैं। लेकिन इतने से हम तीन मौलिक प्रश्नों का उत्तर नहीं पा सकते सो इस चतुर्थ अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग को और अधिक स्पष्ट करते हुए ज्ञानयोग की शिक्षा देते हैं।
    चतुर्थ अध्याय में कुल 42 श्लोक हैं जिनका हम यथा सम्भव श्लोकवार प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय