श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 34
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 34
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान् शत्रु हैं
॥34॥
अभी हमने देखा है कि प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्म करने के लिए उद्द्यत होता है, फिर चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी। तो क्या व्यक्ति व्यक्ति अपनी प्रकृति का दास बनकर जीवन जीने के लिये अभिशप्त है? सनद रहे कि श्रीमद्भगवादगीता के सम्बंध में एक घोर दुष्प्रचार किया जाता रहा है कि गीता हमें इस संसार से विमुख करती है। सत्य यह है कि गीता का अध्ययन हमें "यँहा और अभी" जीवन की उपलब्ध परिस्थितियों में मन , शरीर और बुद्धि के माध्यम से सब अनुभवों को प्राप्त करते हुए जीवन जीने का मार्ग बतलाता है। गीता की शिक्षा तो हमें जीवन के लक्ष्य से परिचित कराती है और इस संसार में जीवन जीने का मार्ग सुझाती है। हमें परिस्थितोयों और रूढ़ियों का दास बनने से रोकती है।
अभी हमने देखा कि प्रत्येक मनुष्य की एक विशेष प्रकृति होती है जो उससे उसी के अनुरूप कर्म कराती है। तो फिर इसमें आगे बढ़ने का वो कौन सा मार्ग हो सकता है जिसपर चलकर हम अपना उत्थान कर पाएं? इस प्रश्न का उत्तर भी इसी गीता में है। व्यक्ति का उसके प्रकृति के अनुरूप जो स्वभाव होता है वह उसके कर्म और विचारों से बनता है। प्रत्येक व्यक्ति के कुछ पसन्द होते हैं, कुछ नापसन्द होते हैं । हमारी इन्द्रियाँ अर्थात हमारे सेंसेज के अपने पसन्द(राग/लाइक्स) और नापसन्दगी(द्वेष/dislikes)होते हैं । यदि हम इन्द्रियों के likes और dislikes में उलझते हैं अर्थात उन्हीं के अनुसार कर्म करने लगते हैं तो फिर हम उनके चपेट में आ जाते हैं और सही और गलत को नहीं समझ पाते हैं। हमें अपने लाइक्स(राग) ही राइट(सही) और dislikes (द्वेष) ही wrong (गलत) लगने लगते हैं और हम उसी likes और dislikes के अनुसार कर्म करते हैं न कि right और wrong के अनुसार। ऐसी स्थिति में व्यक्ति इन्द्रियों के वश में आकर भटक जाता है। इसी कारण इन राग और द्वेष को श्रीकृष्ण लुटेरे कहते हैं जो कर्म के मार्ग पर राहजनी करते फिरते हैं।
यँहा यह समझना जरूरी है कि ये likes और dislikes का जन्म हमारे खुद के अहंकार के कारण होता है जो हमें हमारे likes और dislikes से बाँधते हैं। जिनसे बचने का तरीका है कि हम अपने अहंकार यानी ईगो से बाहर निकलकर चलें, यानी जो कर्मपथ पर बढ़ें तो इन्द्रियों के likes और dislikes के अनुसार न चलकर right और wrong का निर्णय कर के चलें। यदि हमें कँही जाना है, और आगे का रास्ता बहुत खराब है तो क्या आगे जाना छोड़ देंगे? तो फिर गन्तव्य पर पहुंचेगे कैसे? हो सकता है कि आपको मीठा बहुत पसंद है तो क्या मधुमेह की बीमारी होते हुए भी मीठा खाएँगे?
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