श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 1
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 1
श्री भगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥
श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा
॥1॥
श्रीकृष्ण ने द्वितीय और तृतीय अध्याय में योग की शिक्षा दी है। चतुर्थ अध्याय के शुरुआत में ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके द्वारा योग के सम्बंध में जो ज्ञान दिया गया है वह कोई नई बात नहीं है, बल्कि ये एक पुरातन शिक्षा है जो सृष्टि के प्रारम्बज से ही मौजूद है। वस्तुतः प्रत्येक युग में सिद्धि प्राप्त व्यक्ति को इसका ज्ञान रहा है जिसने इसे आगे बढ़ाया है। सिद्धि प्राप्त व्यक्ति वो है जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं। सूर्य सृष्टि प्रारंभ होने का प्रतीक है, साथ ही वह कॉस्मिक एनर्जी का भी प्रतीक है। सृष्टि के प्रारंभ से ये ज्ञान सर्वप्रथम मन में आता है और मन से इक्षा में। अर्थात योग का ज्ञान सर्वप्रथम हमारे अंदर मन मस्तिष्क में उतरता है। तब वह ज्ञान हमारी इक्षाओं को प्रभावित करता है यानी कि ज्ञान की कामना होती है और हमारी इन्द्रियाँ (सेंस ऑर्गन) उसे अभिव्यक्त करती हैं। ये ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है यानी कि ये ज्ञान हमारी परम्परा का भाग है जो हर पीढ़ी में निरंतरता के साथ बना हुआ है। दरअसल ज्ञान /सत्य तो मौजूद रहता है , जब तक हम उसे नहीं जानते है हम अज्ञान में जीते हैं। जब हम उसे पा लेते हैं तो लगता है कि हमने उसका अन्वेषण कर लिया है। ज्ञान की प्राप्ति का अर्थ है कि वह ज्ञान हमारी अभिव्यक्ति का अंश बन जाये और ये अभिव्यक्ति हमारी इन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। दरअसल ज्ञान की उपयोगिता तभी है जब वह मन में तो हो ही साथ ही उसकी कामना और उसका अभ्यास हमारी इक्षाओं में भी हो ताकि वह अभिव्यक्त हो और उस ज्ञान को हम हर अगली पीढ़ी को देते जाएँ अर्थात उसे हम अपनी परम्परा का भाग बना लें।
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