श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 41, 42, 43
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 41, 42, 43
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥
इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
॥41॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
॥42॥
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
॥43॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
॥3॥
अभी तक कि विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि कर्म से पथ भ्रष्ट करने वाला मूल कारण है व्यक्तो का इन्द्रियों के विषयों से विशेष अनुराग का होना। अतएव श्रीकृष्ण तार्किक ढंग से समझाते हुए बताते हैं कि किस तरह से व्यक्ति अपने पापकर्म से मुक्त हो सकता है। इसके निम्न चरण होते हैं
1.सर्वप्रथम हमें ये समझना है कि व्यक्ति की कामनाएँ उसके इन्द्रियों से व्यक्त होती हैं। वाह्य जगत से हमारा सम्पर्क हमारी इन्द्रियाँ ही कराती हैं। इन इन्द्रियों के कारण ही कामनाएँ अपनी अभिव्यक्ति कर्मरूप में अभिव्यक्ति पाती हैं। हम अपने राग द्वेष यानी like-dislike के प्रभाव मरीन होते हैं और उसी के अनुसार कर्म करते हैं। हम नहीं समझ पाते हैं कि क्या सही क्या गलत है बल्कि हम तो अपने राग और द्वेष के वशीभूत होकर कर्म किये जाते हैं।
2.इन्द्रियाँ मन से नियंत्रित होती हैं। जब किसी विषय में डूब जाते हैं, जब हम इन्द्रियों के विषय को पूर्णतः राग-द्वेष से ही निर्धारित करते रहते हैं तो इन विषयों के प्रति हमारा राग और द्वेष(like & dislike) उस विषय के प्रति प्रेम और घृणा (love & hate) में बदल जाते हैं और हम उन विषयों से अपने लगाव या विलगाव के प्रति घोर आसक्ति से भर जाते हैं।
3.तब हमारे कर्मों को तार्किक शक्ति प्रदान करने के लिए हम बुद्धि के स्तर पर अपने विषयों के प्रति अनुराग या विराग को तर्क का जामा पहनाते हैं, चाहते हैं कि हम अपनी बुद्धि से अपने अनुराग या विराग को सही ठहरा सकें।
अतएव यदि हम कर्म के पथ से भ्रष्ट होना बचना चाहते हैं तो
1.सर्वप्रथम इन्द्रियों के विषयों से अनुरक्ति और विरक्ति दोनों से बचना होगा, कर्म लाइक और डिसलाइक से नहीं सही और गलत के दृष्टिकोण से करना चाहिए।
2.राग और विराग से अप्रभावित न होकर मन के स्तर पर इनके प्रभाव को बढ़ने से रोकना चाहिए ताकि मन में किसी के प्रति प्रेम या घृणा के भाव न होकर, समदर्शी हों।
3. इन्द्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण के लिए बुद्धि के स्तर पर कुतर्क गढ़ने से बचें।
इन तीन चरणों को क्रमिक रूप से अपनाने से व्यक्ति विषय, मन और बुद्धि के राग द्वेष से मुक्त होकर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा को प्राप्त हो पाता है, उसके कर्म कर्मयोग के रास्ते हो पाते हैं।
इस शिक्षा को द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त कर चुके हैं। बेहतर समझ के लिए उस अंश को हम यँहा पुनः दुहराना चाहेंगे।
श्लोक 60 की व्याख्या
इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।
लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।
हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।
श्लोक 61 की व्याख्या
उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।
हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।
अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी । इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।
श्लोक 67 की व्याख्या
आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना को सही साबित करने में लग जाती है। बुद्धि पर मन और इन्द्रियों का नियंत्रण हो जाता है और बुद्धि अपने विवेक से निर्णय लेने में अक्षम हो जाती है। इस प्रकार का अयुक्त व्यक्ति अपनी कामनाओं और वासनाओं में उसी प्रकार अनियंत्रित भटकता रहता है जैसे बिना नियंत्रण की नाव वायु के प्रभाव से इधर उधर भटकती रहती है। मन और इन्द्रियाँ बुद्धि को नियंत्रित कर उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा देते हैं। घोड़ा रथ को अपनी इक्षा से इधर उधर ले जाने लगता है। मन का लगाम घोड़े के अनुसार रहकर ढीला पड़ जाता है और लगाम थामे सारथी रूपी बुद्धि लगाम को , और उसके कारण घोड़े को ढीला छोड़कर उनके अनुसार ही हो जाता है। नतीजा में ये शरीर रूपी रथ किधर जाता है ये उस अयुक्त व्यक्ति को भी पता नहीं होता है।
श्लोक 68 की व्याख्या
इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
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