श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 40
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 40
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
॥40॥
कामनाओं को नियंत्रित कर उनसे मुक्त होने के लिए ये जानना आवश्यक है कि कामनाएं होती कँहा है ताकि व्यक्ति उनकी पहचान कर, उनको चिन्हित कर उनसे निजात पा सके। इसे समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि कामनाओं की शरणस्थली तीन हैं। पहली शरणस्थली व्यक्ति की इन्द्रियाँ हैं। प्रत्येक इन्द्रिय के अपने विषय होते हैं जिनकी पूर्ति व्यक्ति करना चाहता है । इस पूर्ति की अपेक्षा से कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। जब उनके प्रति विशेष राग(LIKE) और द्वेष(DISLIKE) उत्पन्न होता तो कामनाओं को मन का साथ मिल जाता है। पुनः जब व्यक्ति अपने पसन्द और नापसन्द में ज्यादा डूबता है तो उनके समर्थन और विरोध में अपनी बुद्धि का उपयोग करने लगता है, अपनी बुद्धि से अपने पसन्द-नापसन्द को सही-गलत ठहराने लगता है। उसके राग(like) और द्वेष(dislike) प्रेम(love) और घृणा(hate) में बदल जाते हैं और उसकी बुद्धि अपने तर्क से उनका समर्थन और विरोध करने लगती है। व्यक्ति सही और गलत नहीं पसन्द और नापसन्द की भावना से ग्रसित होकर कर्म करता है और उसे सही या गलत ठहराने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग करता है।
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