श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 38-39

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 38-39

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
 यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌॥

जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है
 ॥38॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
 कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है
 ॥39॥

 श्रीकृष्ण की दी गई शिक्षा से स्पष्ट होता है कि कामनाओं के कारण ही ज्ञान पर आवरण चढ़ जाता है जिससे व्यक्ति पाप की तरफ उन्मुख होता है। ये कामनाएँ व्यक्ति की प्रकृति से उतपन्न गुणों के कारण होती हैं। जब व्यक्ति के सत्वगुण के कारण कामनाएँ हावी होती हैं तो ऐसी कामनाएँ आत्मविकास और आत्मसाक्षात्कार से जुड़ी होती हैं। ये इक्षाएँ ज्ञान को वैसे ही ढँक कर रखती हैं जैसे धूआँ से अग्नि ढँका होता है। इन कामनाओं से पार पाना सबसे आसान होता है। दूसरी तरफ रजोगुण से जुड़ी कामनाओं से व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं का जन्म होता है जैसे सत्ता की प्राप्ति,नाम, धन की इक्षाएँ आदि। इनसे पार पाना थोड़ा अधिक मुश्किल है क्योंकि ये कामनाएँ ज्ञान को उसी प्रकार ढँक लेती हैं जैसे धूल दर्पण को। तब थोड़ा अधिक प्रयत्न  कर कामनाओं से मुक्ति मिल पाती है। तमोगुण से उतपन्न कामनाओं का सम्बंध शारीरिक सुख से जुड़ा होता है जो सर्वाधिक प्रभावी ढँग से ज्ञान को ढँकती हैं। जिनसे  मुक्त होने में अधिक श्रम और समय लगता है। ये इक्षाएँ ज्ञान को ऐसे ढंकती हैं जैसे भ्रूण को गर्भ में ढँका होता है।  इन कामनाओं से मुक्ति एक प्रकार से एक नए जीवन की प्राप्ति के समान ही है सो ऐसे शारीरिक सुख की कामनाओं से मुक्ति थोड़ी ज्यादा ही कठिन है।
  इस तरह से हम देखते हैं कि हमारी ही कामनाएँ हमारे ज्ञान को कैसे ढँकती हैं। जिस तरह की व्यक्ति की प्रवृत्ति होती है उसी तरह की उसकी कामना होती है और उसी के अनुरूप उसका ज्ञान भी प्रभावित होता है तदनुसार उसके कर्म भी।
 कामनाओं का कभी अंत नहीं होता है। एक इक्षा की पूर्ति में ही दूसरी इक्षाओं का जन्म बसा रहता है। इस कारण से व्यक्ति का ज्ञान हमेशा ही कामनाओं के वश में हुआ रहता है। एक कामना दूसरे कामना के जन्म के लिये इंगन होती है और इस प्रकार कामनाएँ सदैव क्रियाशील रहकर व्यक्ति के ज्ञान को अपने प्रभाव में रखती हैं और इस कारण कामनाओं के वश में रहकर व्यक्ति के कर्म उन कामनाओं की पूर्ति में ही लगे रह जाते हैं। 
अब हम देखें कि ऐसा होता कैसे है, क्योकि इसके मेचानिज्म को समझे बिना इसके प्रभाव से मुक्त होना सम्भव भी नहीं है।

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