श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 37

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 37

श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
 महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌॥

श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान
 ॥37॥

पाप क्या है, बिना इसे समझे हम खुद के कर्मों को परिष्कृत नहीं कर सकते। वस्तुतः जब हम खुद को अपनी स्थिति के अनुसार आवंटित कर्म नही कर अन्य कर्म करते हैं तो वह पाप कर्म है, अर्थात स्वधर्म के अनुसार कर्म न कर  अन्य कोई कार्य करते हैं तो उस अवस्था में वही हमारा पाप कर्म होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम अपनी ही प्रकृति से उपजे गुणों के बंधन में बंध जाते हैं और उन गुणों को अपने इन्द्रियों के भरोसे छोड़ कर जीने लगते हैं। हमने देखा है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति और उनसे उपजे गुणों के अनुसार ही कर्म करता है लेकिन जब उसके कर्म उसके स्वधर्म से न निर्धारित होकर उसके इन्द्रियों (सेंस ऑर्गन) के सुख के लिए ही होते हैं तो वही उस व्यक्ति का पाप कर्म होता है। पांडवों  का अधिकार दुर्योधन और अन्य कौरवों ने छल से छीन लिया था। वैसी स्थिति में पांडव क्या करते? उन्होंने कौरवों से वार्ता का प्रयास किया, शांति प्रस्ताव भी रखा लेकिन कौरव नहीं माने। तब उन्होंने बलप्रयोग का मार्ग चुना क्योंकि यदि वे ऐसा नहीं करते तो कौरव उनके जीवन जीने का भी अधिकार छीन लेते। अर्जुन पांडवों में सबसे सामर्थवान योद्धा था। तो इस परिस्थिति में उसे क्या करना चाहिए था? युद्ध या पलायन? उसकी प्रकृति और उसकी स्थिति के अनुसार युद्ध उसका स्वधर्म था और पलायन पाप। हम सभी अपने जीवन के प्रति क्षण को गौर से देखें। हर घड़ी हमारा कुछ नियत दायित्व होता है, जिनको करना हमारा स्वधर्म है, जिनसे मुँह फेरना पापकर्म है।
श्रीकृष्ण ने द्वितीय अध्याय के श्लोक संख्या 62-63 में इस सत्य को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है जिसके पुनराध्ययन से इस श्लोक का अर्थ बखूबी स्पष्ट होता है। तो आइए पुनः हम उसे देखें--
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।

 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥


विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है

 ॥62॥


क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।

 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥


क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है

 ॥63॥


अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत चिंतन करते हैं उनके प्रति हमारे मन में आसक्ति का भाव जन्म लेता है। वाह्य संसार की अनुभूति इन्द्रियों यानी सेंसेज के माध्यम से ही होती है । खुद से बाहर की विषयों वस्तुओं और व्यक्तियों में जब हम आनंद और सुख की खोज करते हैं तो हम निरन्तर उनकी ही सोच में लगे रहते हैं, व यदि हम उन अनुभूतियों में डूबते हैं तो उनके प्रति एक लगाव भी उत्पन्न होता है। हम उस विषय, वस्तु, व्यक्ति के बारे में जिनसे हम सुख और आनंद की अपेक्षा करते हैं खुश और प्रसन्न होते रहते हैं। जैसे यदि हमको लगता है कि फलाना पद मिल जाने से अथवा फलाना वस्तु मिल जाने से अथवा फलाना व्यक्ति के मिल जाने से अथवा इतना धन हो जाने से हमें बहुत आनंद मिलेगा तो हम निरन्तर उसी के बारे में चिंतन करते रहते हैं। यँहा तक कि उसके वास्तविक प्राप्ति के पूर्व ही हम मात्र उसके मिलने की कल्पना कर के ही खुश होते रहते हैं और उसी में डूबे रहते हैं, उसी के चिंतन और ध्यान में लगे रहते हैं। 

        जिन विषयों पर बहुत चिंतन करते हैं उनसे लगाव हो जाता है। इस लगाव से उन विषयों के प्रति कामना का जन्म होता है हमारे मब में । हम अपनी खुशी, अपने आनंद, और सुख के लिए उन इक्षित वस्तुओं , विषयों आदि पर निर्भर हो जाते हैं और उनके बिना हम अपने सुख की कल्पना भी नहीं कर पाते। हमें लगता है कि यदि वो हमें नहीं मिला तो हस्रा अस्तित्व ही मिट जाएगा। हम इस हद तक उसमें दुबे रहते हैं कि जागृत से लेकर सुप्त अवस्था तक बिना सचेष्ट प्रयास के ही उनका ध्यान करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम उसकी सोच में , उसके ध्यान में डूब गए और दुब जाते हैं। हमारा ध्यान यानी MEDITATION उसी में लग जाता है क्योंकि हमारा उसी में लगाव होता है। हम उसी वस्तु, विषय, व्यक्ति में समाधिस्थ हो जाते हैं क्योकि उसी में हमें सुख मिलता है।

    जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें

1.मोह

हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।

2.लोभ

यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।

3.क्रोध

यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।

4.ईष्या

 इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।

यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।

5.घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर  घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।

     वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी  हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।

   इस तरह हमारे सेल्फ की यात्रा के छह प्रमुख शत्रु हैं

1.काम

2.मोह

3.क्रोध

4.लोभ

5.ईर्ष्या

6.घमंड

और ये पाँच यानी मोह, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड पहले यानी काम की ही सन्तति होते हैं अर्थात प्रथम शत्रु काम है यानी संगत है , परिणाम का बन्धन है।

      अब हम देखते हैं कि इनका परिणाम क्या निकलता है।

1.क्रोध की  कई अभिव्यक्ति होती है, जैसे व्यक्ति दूसरे को हानि करने या खुद को हानि पहुँचाने की कोशिश कर सकता है , निराशा में जा सकता है, आदि। मतलब ये है कि क्रोध के समय व्यक्ति ये नहीं समझ पाता कि क्या करना सही है क्या करना गलत है और न दूसरे ही अनुमान कर पाते हैं कि क्रोधित व्यक्ति कौन सा कदम उठाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसकी बुद्धि मूढ़ हो जाती है, क्रोध की वजह से वह विवेक से काम नहीं कर पाता। विवेक से सोचने की क्षमता जाती रहती है।

2. क्रोध से दिग्भर्मित विवेक से स्मृति भी साथ छोड़ देती है। हम जीवन में बहुत कुछ सीखते रहते हैं, समाजिक और व्यवसायिक जीवन में हमें बहुत सारा ज्ञान मिलते रहता है जो हमारी स्मृति में सुरक्षित रहता है और उस तरह की परिस्थिति आने पर वही स्मृति हमारे सुरक्षित ज्ञान को क्रियाशील कराकर हमसे सही कार्य करा लेती है। हमने अगर सीखा है कि हमें अपने से बड़ों को प्रणाम करना चाहिए तो अगर कोई बड़ा सामने आता है तो वही स्मृति हमें प्रेरित करती है कि हम तुरत उन्हें प्रणाम करें। यदि किसी चिकित्सक ने सीखा है कि शल्यचिकित्सा कैसे की जाती है तो रोगी के बीमारी के दूर करने के लिए वह चिकित्सक अपनी उसी स्मृति के कारण उसका इलाज कर पाता है। लेकिन क्रोध की अवस्था में यह स्मृति साथ छोड़ देती है। क्रोधित मन  के जेहन में सीखा हुआ ज्ञान रहता तो है लेकिन वो क्रोध से अस्थिर हुए दिमाग से बाहर आकर हमारे कार्य में नहीं बदल पाता और क्रोध की अवस्था बीतने पर याद आता है कि अरे हम तो ये जानते ही थे, हमें याद ही नहीं आया। इस प्रकार क्रोध की अवस्था  में  विवेक और  स्मृति दोनों साथ छोड़ देते हैं जिसके कारण हम सही काम नहीं कर पाते।

3.क्रोध से नष्ट स्मृति व्यक्ति के बुद्धि को समाप्त कर देता है। बुद्धि और विवेक स्मृति के आधार पर ही काम करते हैं। स्मृति में संचित ज्ञान यदि समय पर कार्यरूप में नहीं बदल पाता है तो फिर बुद्धि विवेक बेकार के हथियार हो जाते हैं। हमारे पास बहुत ज्ञान का भंडार हो सकता है लेकिन क्रोध की अवस्था में नष्ट हुए स्मृति के कारण यदि यह ज्ञान स्मृति में नहीं रह जाता है तो बुद्धि उसे  कार्यरूप में नहीं बदल पाती। इस प्रकार क्रोध से मूढ़ हुए विवेक के कारण नष्ट हुई स्मृति बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाती और सारा का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।

4. अब जब क्रोध के कारण इस अवस्था में व्यक्ति पहुँच जाता हैं तो  कोई भी लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है और उसका पतन निश्चित हो जाता है।

    इस प्रकार हम देखते कि कामना से वशीभूत व्यक्ति की क्या हालत होती है। इस तरह काम के जाल में फँसा व्यक्ति पतनशील होकर आत्मपथ से विलग हो जाता है। यही व्यक्ति अयोग्य, नीच प्रकृति का कहा जाता है। यह व्यक्ति कुछ भी करने के लायक नहीं होता है। 

 जीवन के प्रत्येक स्थिति में हम इसे अनुभव करते है। ऐसी स्थिति खुद से बाहर खुशी तलाशने से होती है। जब भी हम अपने सुख शांति और आनंद के लिए बाह्य वस्तुओं पर निर्भर करते रहेंगे हमारा पतन अवश्यम्भावी होगा, तरह तरह के लोभ , हिंसा, निराशा आदि बने रहेंगे। तमाम भौतिक उपलब्धि भी हमें उस स्थिति में सुख चैन नहीं दे सकेंगे। हर काल में कामनाओं से बन्धने का यही  फलाफल होता है कि इंसान हमेशा नीच से नीच हरकत पर उतरते रहता है। यह बन्धन हमें जीवन में जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं होने देता है, हम आत्मपथ से विमुख तमाम भौतिक सुख सुविधा के बावजूद दुखी और असन्तुष्ट ही रहते हैं, हमारी खुशी, और हमारे सुख क्षणिक ही रह जाते हैं।



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