श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 36

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 36

अर्जुन उवाचः अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
 अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है
 ॥36॥॥
             ज्ञान के अर्जन का कार्य तब पूरा होता है जब हम प्राप्त ज्ञान को आचरण में अपनाने लगते हैं, उसे अपने व्यवहार में ढाल लेते हैं। कर्मयोग पर श्रीकृष्ण के दिये व्याख्यान को सुनने के पश्चात उसका नियमित पालन करने पर ही उस ज्ञान का महत्व है, लेकिन यदि हम इस ज्ञान की जानकारी के बावजूद इससे कुछ इतर करते हैं तो मिश्चित रूप से कुछ ऐसा कर रहें होते हैं जो बुरे आचरण की श्रेणी में आता है। ज्ञान के एक जागरूक छात्र के मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब वह सब कुछ जान ही रहा है तो फिर उस ज्ञान के अनुसार आचरण न कर गलत ढंग से क्यों आचरण कर रहा है। अर्थात ज्ञान प्राप्ति के बाद ये स्थिति आत्मावलोकन की होती है जिससे ये ज्ञात होता है कि हमारी वे कौन सी कमजोरियाँ हैं जो हमें उस आचरण को अपनाने में बाधक बन रहीं हैं। यदि हम ये आत्मावलोकन नहीं करते तो अपनी कमजोरियों से दूर नहीं होते और तमाम ज्ञान के रहते हुए गलत आचरण करते ही जाते हैं। यही स्थिति अर्जुन की भी है सो उसका प्रश्न एक जिज्ञासु छात्र की तरह है जो ज्ञान प्राप्त कर उसे अपने आचरण में ढालना चाहता है लेकिन अपनी कमजोरियों को नहीं जानता है, सो मार्ग ढूंढ रहा है।

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