श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 33
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 33
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा
॥33॥
जब हम कुछ करने के मार्ग पर चलते हैं तो मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं की जानकारी होनी भी आवश्यक है। यँहा हमें इसी बाधा की जानकारी दी गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। कर्मयोग के मार्ग की सैद्धान्तिक जानकारी भर हो जाने से ये सिद्ध नहीं होता है कि हम उस मार्ग का अनुसरण कर ही लेंगे, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति यानी अपने स्वभाव के वश में होता है और उसी के अनुसार कर्मों को करने हेतु उद्द्यत होता है। सो इस बात की पर्याप्त सम्भाना होती है कि कर्मयोग के ज्ञान प्राप्ति के बावजूद भी वह उस मार्ग पर न चलकर अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म करे। हमने समझा है कि हमारे कर्म हमारे मन के अंदर उठने वाली कामनाओं की कर्मेन्द्रियों के द्वारा कार्यरूप में अभिव्यक्त होने वाली क्रियाएं ही हैं। सो हम जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं। हमारे विचारों की एक श्रृंखला होती है जो हमारे व्यवहार को निर्धारित करती है। यही श्रृंखला हमारे स्वभाव यानी हमारी प्रकृति को निर्धारित करती है। तब प्रश्न उठता है कि हमारे विचाओं की श्रंखला निर्धारित कैसे होती है? इसे तय करते हैं हमारे तीन गुणों यानी तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात। उनके परस्पर अनुपात ही तय करते हैं कि हमारे के मन में किस तरह के विचार उत्पन्न होंगे और वे विचार ही हमारी कर्मेन्द्रियों को अपने अनुसार कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित करते हैं। अज्ञानी हो या ज्ञानी, सभी इसी प्रकृति के अधीन होते हैं और अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्मयोग के आचरण को करने अथवा नहीं करने में समर्थ हो पाते हैं।
इस प्रकार हम समझ पाते हैं कि कर्मयोग के आचरण को अपनाने में हमारी खुद की प्रकृति सह्यायक होती है या बाधा उत्पन्न करती है। इस जानकारी के होने से ही हम आगे की बाधा को पार पाने में समर्थ हो पाते हैं। अन्यथा हमें तो लगेगा कि कर्मयोग के सिद्धांत को हमने जान लिया तो हम कर्मयोगी हो गए।
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