श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 31 एवम 32
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 31 एवम 32
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥
जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं
॥31॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥
परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
॥32॥
किसी भी चीज से लाभान्वित होने के लिए आवश्यक होता है कि हम उस पर भर भरोसा करें ।।जब हम उसपर विश्वास कर उसके सत्य को पहचानते है तो उसे अपनाते हैं। किसी का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं होता, उस ज्ञान के प्रति विश्वास और श्रद्धा होना, और उसको अपने व्यवहार में ढालना भी उतना ही जरूरी होता है। यदि हम अपने ज्ञान को अपने व्यहार में नहीं अपनाते तो फिर वह ज्ञान हमें सत्य का दर्शन नहीं करा पाता। ज्ञान का होने मात्र से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता जब तक वो ज्ञान आचरण में नहीं ढल जाता, और आचरण में ज्ञान के ढलने की शर्त ये होती है कि उस ज्ञान के प्रति हमारे मन में श्रद्धा हो, विश्वास हो, उस ज्ञान के आलोचना में ही हम उलझे न हो।
अब तक कर्मयोग के जो ज्ञान हमें प्राप्त हुए हैं वे तब तक हमारे लिए कल्याणकारी नहीं हैं जब तक वे हमारे आचरण में नहीं आ जातेऔर आचरण में ज्ञान को लाने के लिए आवश्यक है कि हम उस ज्ञान में विश्वास और श्रद्धा रखकर उसका अनुसरण करें। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो फिर जैसा कि हमें कर्मयोग का मार्ग समझते हुए श्रीकृष्ण ने बताया है , हम कर्म करते हुए कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं अन्यथा श्रद्धा और विश्वास के अभाव में सत्य से दूर होकर हम अपनी कामनाओं के जाल में उलझ कर नष्ट हो जाते हैं।
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