श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 30

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
 निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर
 ॥30॥
अब श्रीकृष्ण एक बार फिर से कर्म करने की विधि को समझाते हैं। हमने देखा समझा है कि व्यक्ति की  प्रकृति और पुरुष यानी आत्मा से होती है। हम जो भी कर्म करते हैं वो कर्म हमारी प्रकृति के द्वारा किये जाते हैं। हमारे कर्म हमारी प्रकृति के तीन गुणों के ही परिणाम होते हैं जिनके सम्बन्ध में हमें भ्रांति होती है कि उन कर्मों को तो हम कर रहें हैं, कि हम कर्ता हैं। लेकिन हो ज्ञानी हैं, जो समझदार हैं, वे जानते हैं कि हम जो कर्म कर हैं वे हमारी प्रकृति के तीन गुणों के अनुपात के द्वारा हो रहा है और हमारे सेल्फ की उन कर्मों को करने में कोई भूमिका नही है, बल्कि सेल्फ यानी आत्मा यानी पुरुष तो मात्र साक्षी होता है, उसी के समक्ष प्रकृति के गुण कर्म करे होते हैं।
       हमने ये भी समझा है कि जिन्हें इस सत्य का बोध नहीं होता उनको लगता है कि जो कुछ किया जा रहा है वह सब उन्ही  के द्वारा किया जा रहा है और इस कारण कर्मफल की चिंता , उसका बन्धन हमेशा हमारे इर्द गिर्द घिरा रहता है। इसका कारण ये है कि हम अपने ईगो को ही अपना सेल्फ समझने की भूल करते हैं। ईगो का निर्माण  हमारे मोह, अहंकार, भय, इक्षा, कामना, राग, द्वेष आदि से होता है और जब हम ईगो के परवश होकर कर्म करते हैं तो इन भावों यानी अपने मोह, अहंकार, लोभ, क्रोध आदि के वश में होकर कर्म कर रहें होते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे कर्म हमारे सेल्फ के प्रति समर्पित नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो हमारे ईगो के किसी एक या अदाधिक भावों, यथा राग, द्वेष, प्रेम, मोह, क्रोध, अहंकार आदि के प्रति समर्पित होते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को कर्मों के फलों की चिंता लगे रहना अति स्वाभाविक ही है।
   इसके विपरीत  की स्थिति क्या हो सकती है, इसे समझने के पूर्व हम एक बार पुनः उस शिक्षा का स्मरण करें जिसके अनुसार परमात्मा परम् है और हमारी आत्मा उसी का स्वरूप है, हमारा सेल्फ उसी का स्वरूप है जो साक्षी भाव से हमारी प्रकृति के द्वारा किये जा रहे कर्मों को देख रहा मात्र होता है। जब व्यक्ति अपने कर्म को ईगो के परवश होकर न करे, बल्कि ईगो के सभी भावों से मुक्त होकर करे और उन कर्मों को मात्र अपने सेल्फ यानी आत्मा के लिए करे तो उसके कर्मों से उसके ईगो के भाव निकल जाते हैं और उसकी आत्मा के प्रति समर्पित कर्म उसे अथाह प्रसन्नता का अनुभव देते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति राग-द्वेष, माया-मोह, सफलता-असफलता के द्वंद्व से मुक्त होकर मात्र अपनी आत्मा के प्रति उत्तरदायी होकर कर्म करता है। इस तरह से कर्म  को व्यक्ति हर स्थिति में कर सकता है, चाहे वह घरेलू कार्य कर रहा हो, या फिर पढ़ाई, लिखाई, रिसर्च कर रहा हो, या फिर व्यापर या कार्यालय का काम कर रहा हो। जब व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति समर्पित होकर कर्म करता है तो उसे हर हालत में अपने ही कर्मों से प्रसन्नताआ की अनुभूति होती है क्योंकि तब वह अपने या किसी अन्य के ईगो को यानी लोभ, मोह, माया, प्रेम, क्रोध, अहंकार, भय आदि को सन्तुष्ट करने के लिए कर्म नहीं कर रहा होता है और इस कारण से कर्मफल की चिंता से भी मुक्त हुआ रहता है। यह एक प्रकार से डायनामिक मेडिटेशन  है। इसमें व्यक्ति अपने समस्त ईगो को त्याग कर अपने कर्मो को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देता है। इसमें न तो आशा है, न ही ममता है और न ही दुख ही है। बल्कि इसमें मात्र और मात्र प्रन्नता ही होती है और वो भी बिना माँगे प्राप्त है। यही स्वार्थरहित कर्म भाव भी है। इसी मार्ग से लक्ष्य की प्राप्ति भी सम्भव है। इस अवस्था में व्यक्ति निरन्तर ईश्वर के सम्पर्क में रहता है क्योंकि वह निरन्तर अपनी ही आत्मा में बना रहता है। इस अवस्था में किये जाने वाले कर्म भी उच्च कोटि के होते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति आशा से मुक्त होता है। आशा भविष्य के प्रति उम्मीद है। जब हम आशा  करते हैं  तो हम भविष्य में रहते हैं लेकिन ऐसा कर के हम वर्तमान की उपेक्षा कर रहें होते हैं। सो हमें आशा का त्याग कर वर्तमान में कर्मों के प्रति समर्पित होना चाहिए, ईश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए। इसी प्रकार अहंकार मूलक ममभाव जो "मैं" और "मेरा" से जुड़ा होता है से भी मुक्ति होनी चाहिए क्योंकि इसका सम्बन्ध अतीत से होता है।  हमें अतीत से सीख तो लेनी चाहिए और भविष्य के लिए योजना तो बनानी चाहिए लेकिन उनमें रहना नहीं चाहिए क्योंकि उससे एक प्रकार की उत्तेजना यानी ज्वर उत्पन्न होता है जो वर्तमान की क्षमता को नष्ट करता है। सो व्यक्ति को अपने वर्तमान में रहकर ही कर्म करने चाहिए।  इससे हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा  देता है क्योंकि तब व्यक्ति अतीत के दुख की पीड़ा और सुख के मोह से मुक्त होता है , साथ ही साथ वह भविष्य की कामना से  और चिंता से मुक्त होता है, और इस प्रकार व्यक्ति वर्तमान में दुख, चिंता आदि से मुक्त होता है जिससे उसके वर्तमान का क्षरण नही। होता है। इस अवस्था में व्यक्ति समत्व भाव में आ जाता है जिसके कारण वह ईगो जनित भावों से मुक्त होकर वर्तमान में कर्म करता हुआ अपनी आत्मा और परमात्मा से जुड़ जाता है। यही तो डायनामिक मेडिटेशन है जिससे हमें पतमात्मा की प्राप्ति होती है। इस स्थिति में आध्यात्मिक स्तर पर हम हमेशा ही सफल होते हैं।

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