श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 29

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 29

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
 तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
 ॥29॥

उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि जिनको कर्म के मार्ग का ज्ञान नहीं होता है वे तो मन की इक्षाओं की पूर्ति के लिए ही कर्म करते हैं। इक्षाओं कि पूर्ति की आवश्यकता से प्रेरित कर्म करने वाले सदा ही कर्मफल से बन्धें होते हैं। कर्मफल से बंधे होने के कारण उनको इक्षाओं से आगे कोई मार्ग नहीं सूझता। ऐसे लोग ही अज्ञानी कहे जाते हैं। ऐसा नहीं कि जो शिक्षित नहीं हैं वे ही अज्ञानी होंगे। जो कोई भी मात्र इक्षा पूर्ति के लिए जीवन जीता है , उसकी उपलब्धि चाहे जो हो वह अज्ञानी ही होता है। इसके विपरीत ज्ञानी वो है जिसे कर्मफल में कोई आसक्ति नहीं होती। 
    समाज में दोनों तरह के लोग होते हैं। ज्यादातर लोग तो कर्मफल में ही बंधे होते हैं। तो प्रश्न उठता है कि फल में आसक्त लोगों के साथ अनासक्त व्यक्ति का व्यवहार कैसा होना चाहिए, क्या ऐसे ज्ञानी व्यक्ति को अज्ञानियों के साथ कोई जोर जबरदस्ती करनी चाहिए या उनको उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए? वस्तुतः यँहा श्रीकृष्ण ART OF PERSUATION की बात करते हैं जो समाज में बिना संघर्ष उतपन्न किये समाधान की ओर ले जाता है। वस्तुतः ऐसे ज्ञानी लोगों को चाहिए कि वे फल में आसक्त लोगों को धीरे धीरे यकीन दिलावें कि कौन सा मार्ग जीवन के बृहत्त लक्ष्य के अनुरुप है। हमें स्मरण रहे कि इसके पूर्व भी श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि श्रेष्ठ जनों को चाहिए कि वे अपने आचरण के उदाहरण से लोगों को प्रेरित करें कि लोगों को किस प्रकार से कर्म करने हैं। ये विधि सामान्य लोगों में कर्म करने के अनासक्ति के तरीके में विश्वास दिलाता है।

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