श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
 गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
 ॥28॥
हमने देखा है कि श्रीकृष्ण परिणाम से असंग(detached) होकर कर्म करने की शिक्षा देते हैं लेकिन सवाल ये उठता है कि कर्म के  परिणाम से खुद को विच्छेदित कर कर्म किया कैसे जाए। जब हम परिणाम से जुड़कर कर्म करते हैं तो ये प्रतीत होता है कि हम कर्म कर रहें हैं यानी कर्ता हम ही हैं। क्या ये सोच सही है? इसे समझने के लिए हमें अपनी आँखें थोड़ी और खोलनी होगी, अपने बौद्धिकता पर थोड़ा और बल देना होगा। हमें पुरुष और प्रकृति की अवधारणा को समझना होगा। प्रकृति मैटर को कहते हैं जबकि पुरुष उस प्रकृति का कॉन्सियसनेस है। यँहा पुरुष का अर्थ स्त्री और पुरुष से नहीं है, बल्कि पुरुष यानी कॉन्सियसनेस से है। प्रकृति में तीन गुण विद्यमान रहते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। ये गुण प्रकृति में हमेशा ही विद्यमान होते हैं और यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। इनकी परस्पर मात्रा के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बनता है लेकिन यह व्यक्तित्व हमारे ईगो की दर्शाता है न कि हमारे स्व को।
तमोगुण यानी inertia यानी जिस अवस्था में हैं उसी अवस्था में बने रहने का गुण है। रजोगुण activity को व्यक्त करता है । मैटर अपने तमोगुण के कारण अपनी स्थिति में बना रहता है लेकिन रजोगुण उसे गति देता है। मैटर भले ही एक ही अवस्था में पड़ा रहे अपने तमोगुण के कारण, उसका रजोगुण उसे अंदर से चलायमान रखता है, परिवर्तनशील रखता है। अब आता है सत्वगुण यानी intellect जो मैटर को बुद्धि यानी intelligence यानी एक क्रमबद्धता प्रदान करता है। इन तीन गुणों की परस्पर जितनी मात्रा हमारे अंदर होती है हमारी प्रकृति भी उसी के अनुसार होती है।
इस प्रकृति में 24 तत्व होते  हैं।
प्रथम पाँच तत्व हैं-
आकाश, 
वायु, 
अग्नि, 
जल और 
पृथ्वी। 
 इन पाँच तत्वों की अपनी विशेषताएँ हैं, यथा
आकाश-ध्वनि sound
वायु- स्पर्श  touch
अग्नि-दृश्य/आकार/रंग sight
जल-स्वाद taste
पृथ्वी-गन्ध smell
ये पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। ये पाँच हमारी पाँच ऑर्गन्स ऑफ परसेप्शन को व्यक्त करते हैं
1.सुनने की क्षमता
2.स्पर्श की क्षमता
3.देखने की क्षमता
4.स्वाद की क्षमता
5.गन्ध (सूंघने) की क्षमता
ये  पाँच हमारी पाँच कर्मेन्द्रियों के कारक हैं, जो इस प्रकार हैं
1. जिह्वा speech
2.हाथ,
3.पैर , 
4.जननेन्द्रियां, 
5.उत्सर्जन के अंग,
ये पाँच व्हिकरण हैं। जिनके अतिरिक्त चार अंतःकरण के भी तत्व हैं जो निम्न हैं
1.मन mind
2.बुद्धि intellect
3.चित्त memory
4.अहंकार ego
ये कुल 24 तत्व प्रकृति के द्वारा जन्म लेते हैं और इन 24 तत्वों को के प्रति जागरूक है वह है कॉन्सियसनेस।
उपरोक्त 24 तत्वों को प्रकृति के तीनों गुण प्रभावित करते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयम के साथ ही बरतती रहती है और इस प्रकार कार्य और करण एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।सभी कर्म इन 24 तत्वों के समव्यव्हार के परिणाम होते हैं। इस प्रकार ये गुण और ये तत्व हमारे व्यक्तिव का निर्माण करते हैं। इससे "मैं" का जन्म होता है और ये आभास होता है कि मैं ही कर्ता हूँ। इससे अहंकार का जन्म होता है। इस अहंकार से ओतप्रोत ईगो को लगता है कि मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही सब कुछ करने और भोगने वाला हूँ। इस स्थिति में व्यक्ति आत्मा और ईगो में फर्क नहीं कर पाता है, उसे लगता है कि उसकी प्रकृति ही पुरुष है, उसका ईगो ही उसका सेल्फ है। एक उदाहरण लें। एक कंप्यूटर कई तरह के कार्य करता है लेकिन वह तभी कार्य करता है जब विद्दयुत की आपूर्ति होती है। तो क्या विद्युत कुछ करता है? नहीं । विद्युत कंप्यूटर को ऊर्जा प्रदान करता है जिसका उपयोग कर कंप्यूटर अपना कार्य कर पाता है। इसी प्रकार कर्म तो प्रकृति के द्वारा किया जाता है किंतु आत्मा के द्वारा उसकी प्रकृति को ऊर्जा प्रदान की जाती है, आत्मा कुछ नहीं कर रहा होता है, हम जो कुछ कर रहें होते हैं वह हमारी प्रकृति कर रही होती है। इस प्रकार प्रकृति को पुरुष से अलग कर देखने पर ज्ञात होता है कि हम जो कुछ कर रहें हैं वे सब हमारी प्रकृति के अनुसार कर रहें हैं, हमारा पुरुष यानी आत्मा तो मात्र करने की ऊर्जा भर है। वो हमारा न तो कर्म है न ही कर्म करने का परिणाम ही है।  इससे स्पष्ट है कि हमारे कर्म हमारी प्रकृति की देन है। सो अगर हम अपना अहंकार त्याग भी दें तो भी हम कर्म करते रहेंगे। यह प्रकृति का नियम है। इसी नियम में बंध कर सभी कर्म करते हैं। लेकिन अहंकार से ढँके मन और बुद्धि को लगता है कि ये कर्म हमारे सेल्फ के कर्मों के परिणाम हैं। जब इस अहंकार का नाश होता है तब हमें ज्ञात होता है कि हम जो कर रहें हैं , हमारे कर्म हमारे प्रकृति की देन हैं। 
जो तत्वज्ञानी है उसे तत्वो और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है। तत्वज्ञानी को पता है कि सोचना, समझना, निर्णय लेना कर्म करना आदि सभी प्रकृति की देन हैं।  ये सब प्रकृति के नियमों की देन हैं। कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सब कुछ का कोई न कोई कारण है, भले व्यक्तिगत रूप से हम उस कारण को जानते हों या नहीं। इस आज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि प्रकृति के नियमों का कोई कारण नहीं है। ये तो हमारी अज्ञानता के कारण होता है। जब हम उस नियम और उसकी व्यख्या को समझ जाते हैं तो हमें लगता है कि हमने कोई रहस्य पा लिया है या खोज लिया है। जो व्यक्ति गुणों और कर्म के इस सम्बंध को समझता है वही तत्वज्ञानी है। इस अवस्था में वह व्यक्ति आत्मा और प्रकृति के अंतर को समझ पाता है।  तब उसे समझ में आता है कि गुण गुण में ही बरतते हैं। ऐसा व्यक्ति कर्म और उसके परिणामो के बंधन में नहीं पड़ता, उसे ज्ञात होता है कि जो कुछ वह कर रहा है वे सब उसकी प्रकृति के कारण हैं, उसका सेल्फ उसके कर्मों से अलग है। इसका ज्ञान और अभ्यास आसक्ति से अलग करता है। यँहा भावना नहीं बुद्धि की प्रधानता होती है।
इसे यूँ समझें कि व्यक्ति के कर्म होते कैसे हैं। हमने अब तक देखा समझा है कि प्रकृति, उसके गुण और तत्व कर्मों के कारण हैं। तीनों में से जिस गुण की अधिकता हमारी प्रकृति में होती है हमारे कर्म भी उसी के अनुरूप होते हैं क्योंकि तब तत्वों का व्यवहार भी प्रमुखता के साथ उन उस गुण के अनुसार हो जाता है। हमारे मन के अंदर जो इक्षाएँ होती हैं वो हमारी प्रकृति के गुणों के अनुसार हीं होती हैं और उन इक्षाओं की अभिव्यक्ति कर्म के रूप में हमारे कर्मेन्द्रियों के माध्यम से व्यक्त होते हैं।  जब हम स्वप्न में होते हैं तो उस स्वप्न के साथ हमारा एक तादाम्य होता है और उसी के अनुसार हमें सुख और दुख का स्वप्न में बोध होता है, लेकिन उस  स्वप्न की और उससे जनित सुख और दुख की अनुभूति मात्र हमारी होती है। जैसे ही स्वप्न से ये तादाम्य टूटता है इस सुख और दुख से मुक्ति भी मिल जाती है। उसी प्रकार जब हम अपनी इक्षाओं से विच्छेदित हो जाते हैं तो उन इक्षाओं के अनुरूप मिल सकने वाले सुख और दुख भी समाप्त हो जाते हैं। तब हमसे जो कर्म होते हैं उनसे सुख या दुख नहीं मिलते। आसक्ति से तादाम्य का अभाव ही कर्म को कर्तव्य में परिवर्तित कर देता है । यही विवेक है। तत्वज्ञानी को ये विवेक सदा ही होता है। उसे कोई आसक्ति नहीं होती है, सो उसे पता होता है कि राग-द्वेष, सफलता-असफलता, प्रवृत्ति-निवृत्ति ये सब मन के भाव हैं जिनसे कोई आसक्ति नहीं रखना है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता ही नहीं।
    अर्जुन महाबाहो है, अर्थात महावीर है । श्रीकृष्ण उसे ये सम्बोधन दे कर याद दिलाते हैं कि सच्ची वीरता युद्ध की ही वीरता नहीं होती है बल्कि आसक्ति पर विजय ही सच्ची वीरता है जिसे अर्जुन को वरण करना है।

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