श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 22 से 26
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 22 से 26
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
॥22॥
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
॥23॥
यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥
इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ
॥24॥
कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥
हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे
॥25॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥
परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
॥26॥
अभी तक श्रीकृष्ण कर्म करने की अनिवार्यता पर पर्याप्त प्रकाश डाल चुके हैं और ये भी समझा चुके हैं कि हर व्यक्ति को अपने आचरण से खुद को एक प्रतिमान के रूप में स्थापित करना चाहिए ताकि लोग उस व्यक्ति के आचरण का अनुकरण करे। इससे समाज में उच्च कोटि के आचरण का प्रचलन बढ़ता है जिससे पूरा समाज लाभ प्राप्त करता है।
खुद को यदि आप इतना ऊपर उठा पाते हैं कि आप खुद ही उदाहरण बन जाएं तो लोग कही सुनी पढ़ी बातों के मुकाबले आपसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
इसीलिए कर्म करने की अनिवार्यता को पुख्ता करने हेतु अर्जुन के समक्ष स्वयं अपना उदाहरण देते हैं। अपने युग में श्रीकृष्ण ने वो सारी उपलब्धियाँ हासिल की थीं जो कोई एक मनुष्य की इक्षा हो सकती थी। वो विद्वान थे, उन्होंने राज्य बनाये, राज्य दूसरों को दिया, ज्ञान की अपरिमित उपलब्धि हासिल की, युद्ध कला में निपुण थे, और परमसिद्धि को प्राप्त थे। उनके लिए कोई कर्म न बड़ा था, न छोटा। वे राजा भी बने, अतिथियों और ज्ञानीजनों के पैर भी धोए, उनको समाज में सर्वक्षेष्ठ मानकर पूजा भी गया(राजसूये यज्ञ) और जूठन भी बटोरा(उसी राजसूये यज्ञ में) । महान योद्धा होकर भी अर्जुन के सारथी बने। इतना होने पर भी उन्होंने कभी कर्म से मुँह नहीं मोड़ा, हमेशा कर्म में प्रवृत्त रहे, जन्म से लेकर इस ज्ञान को देते वक्त के समय के बीच श्रीकृष्ण के जीवन में ऐसा एक भी अवसर नहीं आया जब उन्होने कर्म से विमुखता दिखाई हो, तब भी पूर्ण पारिवारिक होते हए भी योगी कहे जाते थे। उनके मित्र और शत्रु दोनों उनका आदर करते थे।
खुद अपना उदाहरण देकर श्रीकृष्ण ये समझाते हैं कि यदि उन्होंने कर्म करना छोड़ दिया तो वे लोग भी जो उनसे प्रभावित होकर कर्म में प्रवृत्त होते आये हैं वे भी निष्क्रिय हो जाएंगे और कहेंगे कि जब कृष्ण जैसा महान व्यक्ति कर्म नहीं करता, तो भला वे क्यों करें। इससे समाज में भारी अराजकता आएगी। हमसब खुद अपने घर परिवार से लेकर समाज में ऐसे ढेरों उदाहरण पाते हैं। कहा भी जाता है कि इंसान जो देखता है वही सीखता है, वही करता है, वही उसका स्वभाव बनते जाता है। ऐसा इंसान ही वर्णसंकर है जो अपने स्वधर्म से विचलित हुआ कर्म नहीं करता है। और इस तरह के वर्णसंकरों के पैदाइश के लिए महान व्यक्ति ही जबाबदेह होते हैं जो क्षमता होते हुए भी पथप्रदर्शक नहीं बन पाते।
इस स्थिति से बचने का एक ही तरीका होता है कि व्यक्ति मनोयोग से निरन्तर कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करता रहे ताकि उसे आदर्श मानने वाले भी उसी मार्ग पर चल सकें और समाज का उत्थान हो सके। यँहा एक बात और महत्वपूर्ण है समझना। समाज में ऐसे भी लोग होते हैं जो गलत मार्ग से हटने के लिए तैयार नहीं होते। तो क्या ऐसे व्यक्ति के साथ क्या किया जाना चाहिए? उस व्यक्ति के समक्ष निरन्तर अच्छे आचरण का उदाहरण प्रस्तुत किया जाए। अच्छे आचरण का उपयोगी प्रभाव देखकर अंततः वह हठी व्यक्ति भी धीरे धीरे रास्ते पर आ ही जाता है। ज्ञात अज्ञात इतिहास में और वर्तमान में ऐसे ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं। महान नायक के अनुकरण के लिए बहुत लोग प्रस्तुत हो उठते हैं जिससे उस महान नायक का समाज भी महानता के मार्ग पर अग्रसर होता है। महान नायक कौन होता है? जब सामान्य व्यक्ति को सगी मार्ग दिखाना होता है तो उस व्यक्ति को मार्ग दिखाने का तीन तरीका होता है। एक तरीका होता है उकसाने का, दूसरा तरीका है उत्साहित करने का और तीसरा तरीका है प्रेरित करने का। यानी नायकत्व के तीन रूप होते हैं
Leadership through Instigation
Leadership through Motivation
Leadership through Inspiration
जब पीछे वाले को महान व्यक्ति अपने कर्मों के माध्यम से रास्ता दिखाता है तो वो पीछे वालों को आगे बढ़ने का व्यवहारिक मार्ग बता रहा होता है, वो व्यवहार में लाये जा चुके आचरण से लोगों को भरोसा दिला रहा होता है कि वे भी उस मार्ग पर चलकर ऊपर उठ सकते हैं। सो परम् ज्ञान प्राप्त किये व्यक्ति के लिए कर्म करना उतना ही जरूरी है जितना उस मार्ग पर चलना शुरू करने वाले व्यक्ति के लिए। सो ऐसी कोई अवस्था नहीं है जब व्यक्ति कर्म से विमुख होकर रह सके।
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