श्रीमद्भ्भवादगीता अध्याय 3 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लिक 21


यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
 स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है ।
 ॥21॥
समाज में  व्यक्ति दूसरों को देख कर बहुत कुछ सीखता करता है। विशेषकर हम जिसे श्रेष्ठ मानते हैं  वे हमारे आदर्श होते हैं । ऐसी स्थिति में उस श्रेष्ठ/आदर्श व्यक्ति को उदाहरण मानकर हम भी उसी ककानुसरण करते हैं। इस समाज में प्रत्येक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का आदर्श होता ही है। एक बात और महत्वपूर्ण है। हम क्या बोलते लिखते हैं इससे हमारी श्रेष्ठता नहीं निर्धारित होती है, बल्कि हम उस रूप में देखे जाते हैं जिस रूप में हमारा आचरण होता है अर्थात हमारा मूल्यांकन हमारे आचरण पर निर्भर करता है। यदि हम भाषण देते फिरे कि भ्रष्टाचार मत करो, चोरी मत करो, और खुद चोरी करते रहे तो हमें लोग चोर के रूप में ही याद रखते हैं। बच्चों को यदि आप सिखाते हैं कि झूठ मत बोलो और खुद हम हीं झूठ बोकते रहें तो बच्चे हमारे झूठ नहीं बोलने को आत्मसात न कर हमारे झूठ बोलने के आचरण का ही अनुसरण करते हैं। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा सिखाती है कि हमें अपने कर्मों के आचरण को उच्च कोटि का रखना चाहिए ताकि जो हमारा अनुसरण कर रहें हैं वे भ्रष्ट न हो जाएं। ऐसा करना हमारी जबाबदेही है अन्यथा समाज या समाज के वे अंश जो हमारा अनुसरण करते हैं वे भी भ्रष्ट हो जाएंगे। सो समाज के व्यावक उत्थान के लिए हमारा कर्म में प्रवृत्त होते रहना अति आवश्यक है। ध्यान रहे यही आज की तारीख में रोल मॉडल का कांसेप्ट है। हम अपने रोल मॉडल के हर आचरण को बहुत ही ध्यान से अवलोकन करते हैं, उसके आचरण को ही प्रमाण मानते हैं और खुद को उसी के अनुसार ढालने की कोशिश करते हैं। इसलिए व्यक्ति का ये कर्तव्य बनता है कि समाज के लिए वो उच्च कोटि का आचरण करे ताकि लोग उसका अनुसरण कर समाज  को पतन से बचाएँ।

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