श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7
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यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥
अब तक श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्म के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है। पहला कदम कर्म का उठता है,तब दूसरा कदम ज्ञान का है। कर्म नीव है, ज्ञान उसका अंतिम छोर है। बिना नीव के छत भला कैसे तैयार होगा। कर्म हमेशा हैं लेकिन कर्म करना कैसे है कि ज्ञान प्राप्त हो सके? क्या किसी भी तरह से कर्म करने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नहीं। कर्म करने का नियत तरीका है, और वह तरीका है कर्मयोग का है। बलात इंद्रोयों को दाब कर, बलात अपने सेंसेज को शांत कर यदि कोई कर्म करता है तो वह कर्मयोग का आचरण नहीं है। द्वितीय अध्याय को यदि हम फिर से देखें तो हमें स्मरण होगा कि कर्म करने में यदि हम जबरन इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं तो ऊपर से शांत दिखने वाली हमारी इन्द्रियों के विषय समाप्त नहीं होते, बल्कि वे सुप्त रहते हैं जो अनुकूल अवसर पाते ही हमारे कर्मों को अपने विषयों में खींच लेते हैं। अतएव कर्मयोग में कर्म करने में जबरन अपने सेसेस को नियंत्रित करने का कदापि प्रयास न करें।
            इन्द्रियों के द्वारा हमारी इक्षाएँ, हमारी कामनाएं अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं । जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित होती हैं तो उनकी अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जाती हैं और हम अपनी पसंद से कर्म करने लगते हैं जो जरूरी नहीं कि सही भी हों। नतीजा ये निकलता है कि सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है। यदि सड़क पर सभी अपनी ही इक्षा से गाड़ी चलाने लग जाएं तो सड़क पर भीषण जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका निदान क्या है? क्या सभी को चलने से रोक दिया जाए? यह तो कोई निदान नहीं हुआ। तो इसका निदान है कि लोगों के चलने के नियम बना दिये जायें और उनका पालन किया जाए। कर्मों के करने में सिर्फ इन्द्रियों पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता है, बुद्धि से उनपर नियंत्रण जरूरी है ताकि हम इन्द्रियों को वश में रखकर सही मार्ग से चलें न कि पसंदीदा मार्ग के लोभ से चलें। अब ये कैसे हो सकता है? इसका सरलतम उपाय है कि हम अपनी बुद्धि को उत्तोरोत्तर ऊँचा लक्ष्य दें। एक छात्र है। उसका काम अच्छी तरह से पढ़ाई करना है। यदि वह इस तथ्य से अवगत है कि समय का सदुपयोग कर, यदि वह संयमित होकर  पढ़ाई करेगा तो उसे किसी बाहरी व्यक्ति के डर से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वो खुद ब खुद मेहनत करेगा। लेकिन यदि उस छात्र की बुद्धि में उच्च लक्ष्य नहीं हैं, उसके अभिभावक चाहते हैं लेकिन वो नहीं चाहता तो अभिभावक के दबाव और डर से वह पढ़ने तो बैठता है लेकिन उसकी आँखें पुस्तक पर रहते हुए भी मस्तिष्क कँही और होता है, अपने प्रिय काम में लगा होता है। नतीजा होता है कि पढ़ने का उपक्रम कर के भी नही पढ़ पाता। उसके कर्म उसके सही के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उसके पसन्द से नियंत्रित होते हैं। वह उन्द्रियों के प्रभाव में इधर उधर भटकता रह जाता है।
   इस प्रकार श्रीकृष्ण इस मत का साफ साफ खंडन करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें या तो कर्म करने ही नहीं चाहिए या फिर इन्द्रियों को जबरन दाबकर कर्म करना चाहिए। उनका मत है कि कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करें, जिसमें कर्मफल से कोई आसक्ति नहीं होती। इस अवस्था में कामनाओं के वश में किये जाने वाले कर्मों से भी वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं, मन धीरे धीरे शांत हो चलता है और हम शनैः शनैः ज्ञान के मार्ग पर बढ़ जाते हैं। कर्मयोग से किये कर्म से ही ज्ञान मिलता है, कर्म के छोड़ने से नहीं।

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