श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 6
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 6
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
॥6॥
श्रीकृष्ण कर्म करने की महत्ता आगे बढ़ाते हुए कुछ ज्यादा मुखर होकर कहते हैं कि बिना ज्ञान के कर्मेन्द्रियों को बलात रोककर मन ही मन उन इन्द्रीयो के विषयों के चिंतन में लगे रहना ढोंग है। हम इन्द्रीयों द्वारा संचालित शारीरिक चेष्टाओं को तो बल पूर्वक रोक सकते हैं लेकिन इन्द्रीयिओं के विषय से सम्बंधित मन मस्तिष्क में चल रहे विचारों को नहीं रोक सकते बलपूर्वक। इस प्रकार ऊपर से शांत दिखने वाला व्यक्ति मन ही मन बहुत ही उद्वेलित हुआ रहता है, उसका ध्यान हमेशा बाहरी चीजों पर ही टिका हुआ रहता है। इस प्रकार का आचरण ढोंग ही है। हम सभी जब भी पूजा पाठ ध्यान आदि में लगते हैं बार बार अपने इष्ट और अनिष्ट् के बारे में सोचते रहते हैं। हम ध्यान नहीं करते बल्कि ध्यान का ढोंग करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ने यँहा इशारा कर दिया है कि बिना कर्म के ध्यान की अवस्था पाने की ख्वाहिश महज मिथ्या आचरण है, और कुछ नहीं। इस जगह पर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मयोग के बिना कोई भी ध्यान सम्भव ही नहीं है।
Comments
Post a Comment