श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 20
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥
जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
॥20॥
हम अभी तक देख चुके हैं कि युद्धक्षेत्र में युद्ध से विमुख हुए अर्जुन को श्रीकृष्ण के तरह से कर्म करने की महत्ता को समझा चुके हैं। जीवन के धरातल पर कोई व्यक्ति कर्म किये बिना नहीं रह सकता और जो कर्म किये बिना जीना चाहता है श्रीकृष्ण उसे ढोंगी और चोर तक कह चुके हैं। कर्म ही वह मार्ग है जिसपर चलकर कोई भी व्यक्ति अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। दूसरा कोई विकल्प है ही नहीं। कौन सा कर्म करें, किस तरह करें इसपर भी पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को दो बातें समझाते हैं-
1.कर्म करके ही लोग अपने परमसिद्धि को प्राप्त करते हैं इसके अनेकों उदाहरण हैं। गीता के रचनाकाल के अनुसार श्रीकृष्ण उससे भी पहले के लोगों के उदाहरण देते हैं जो कर्म करते हुए अपने महान लक्ष्य को प्राप्त किये थे, जैसे राजा जनक।
राजा जनक एक क्षत्रिय थे, वे राजा भी थे और आजीवन राजा रहे, किन्तु बिना राजा का दायित्व त्यागे राजा जनक निरन्तर अपने कर्मपथ पर अग्रसर रहे और उसी रास्ते चलकर परमसिद्धि को प्राप्त भी हुए और उसके पश्चात भी राजा बने रहे, अपने दायित्वों को छोड़ छाड़कर जंगल में जाकर हरिभजन नहीं करने लगे थे।
2. उपरोक्त उदाहरण से श्रीकृष्ण दो बातें स्पष्ट करते हैं
एक कि बिना अपने दायित्व से विमुख हुए, कर्म करते रहने से ही व्यक्ति अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
और दूसरा कि अपने लक्ष्य प्राप्ति यानी परमसिद्धि को प्राप्त कर भी इस प्रकार का व्यक्ति कर्म से विमुख होकर कर्महीन नहीं बन जाता है, बल्कि अन्य लोगों के लिये उदाहरण बनकर कर्म करते रहता है और अन्य लोग जो उस लक्ष्य तक अभी नहीं पहुँचे हैं उनके लिए प्रेरणास्रोत बन जाता है। उसे देखकर अन्य व्यक्ति भी समझ पाते हैं कि वे भी उस तरह का लक्ष्य पा सकते हैं और वे उस परमसिद्ध व्यक्ति के उदाहरण से ये भी जान पाते हैं कि उनको क्या और कैसे कर्म करने हैं कि वे भी लक्ष्य को हासिल कर पाएं।
इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को और अर्जुन के माध्यम से समस्त व्यक्तियों को ये समझाते हैं कि हमें कर्म दो कारणों से करना ही है
1.स्वयम के लिए परमसिद्धि की अवस्था प्राप्त करने के लिए, अर्थात अपना परम् लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, और,
2.अन्य लोगों के लिए जो अभी कर्मपथ पर अग्रसर नहीं हुए हैं या अभी अग्रसर हो रहें हैं उनके लिए उदाहरण बनकर प्रस्तुत होने के लिए।
इस प्रकार श्रीकृष्ण समाज को सुप्तावस्था से बचाने, उसे सतत गतिशील और प्रगतिशील रख सकने की शिक्षा देते हैं। यँहा तक कि नैष्कर्म की अवस्था में भी कर्म ही है जो व्यक्ति को नैष्कर्म्य रखकर भी उसे खोजी, अन्वेषी बनाता है।
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