श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 2
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 2
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥
आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ
॥2॥॥
श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार प्राप्त करने के कारण अर्जुन की बुद्धि एक बार फिर से दिग्भ्रमित हुई है लेकिन अच्छी बात ये है कि अर्जुन अपने भ्रम को स्वीकारता है और यह स्विकारिक्ति प्रारम्भ में ही हो जाती है , अन्यथा उसका भला नहीं हो पाता। वैसे भी जागरूक विद्यार्थी वही है जो ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में होने वाले भ्रमों का तत्काल निराकरण कर लेता है या करा लेता है अन्यथा भ्रमित ज्ञान के साथ आगे बढ़ने वाले छात्र को कभी भी सही ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता। अपितु उसे घोर अज्ञान ज्ञान के नाम पर मिलता है। हम सभी को भी यही करना चाहिए जो अर्जुन कर रहा है। यदि अपने पूर्वाग्रहों के कारण या किसी अन्य कारण से हम कोई बात नहीं समझ पा रहें हों तो निश्चित ही हमें शंका का समाधान कर लेना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मोक्ष परम् लक्ष्य है, बन्धन से मुक्ति परम् लक्ष्य है, आत्मा अजर, अमर और अपरिवर्तनशील है किंतु इसे प्राप्त करने का मार्ग है निष्काम कर्म करना, जिसे करते हुए हम कर्म बन्धन से मुक्त होकर आत्म साक्षात्कार को प्राप्त होते हैं। युद्ध नहीं लड़ने के अपने पूर्वाग्रहों के कारण अर्जुन निष्काम कर्म मार्ग की यात्रा को भूलकर अंतिम लक्ष्य यानि ज्ञान प्राप्ति को याद रखता है। लेकिन उसकी चेतना अभी भी सजग है सो उसे पता है कि वह भ्रमित है। यही बात अर्जुन को सत्य के अन्वेषण में लगे अन्य छात्रों से अलग करती है। सत्य के प्रति उसकी उत्कण्ठा इतनी तीव्र है कि अपने पूर्वाग्रहों के पश्चात भी वह सत्य की प्राप्ति के लिए प्रश्न करता है कि सांख्य और कर्म में कौन श्रेष्ठ है जो उसे श्रेय देगा अर्थात अर्जुन कल्याण का आकांक्षी है। यँहा यह स्पष्ट संकेत है कि अर्जुन उस मार्ग को अपनाना चाहता है जो उसे श्रेय दें अर्थात उसका कल्याण करें न कि अर्जुन अपने पसंद के मार्ग पर टिका हुआ रहना चाहता है।
अर्जुन के प्रश्नों से कुछ बातें हमारे जीवन में साफ हो जाती हैं--
1.हमें समझना चाहिए कि हमें जो सिखाया जाता है उसे हम तब तक हु ब हु नहीं समझ सकते जब तक हमारे अंदर हमारे पूर्वाग्रह बने हुए हैं।
2. पुराग्रह प्राप्त होने वाले ज्ञान को अपने अनुसार सरलीकृत कर देते हैं या उलझा देते हैं।
3.यदि हमें याद है कि हमारे पूर्वाग्रह बने हुए हैं और ये ज्ञान को भ्रमित कर रहें हैं तो हमें पता होता है कि ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में हमें भ्रम और शंका हो रहा है।
4. अगर इतनी जागरूकता है तो हमें तत्काल अपना शंका समाधान करना चाहिए क्योंकि भ्रमित ज्ञान अज्ञान से भी अधिक खतरनाक होता है।
5. हमें प्रिये से अधिक श्रेष्ठकर पर ध्यान चाहिए। हमें कल्याण और सत्य के मार्ग को पकड़ने के लिए इक्षुक और प्रस्तुत रहना चाहिए भले इसके लिए लिए अपने पसंद यानी LIKE का त्याग करना पड़े।
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