श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 19


तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
 असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
 ॥19॥

अब तक श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की अनिवार्यता को बहुत तरीकों से समझा चुके हैं। हम सभी को ये ज्ञात हो चुका है कि कर्म करके ही हम कँही पहुंच सकते हैं। बिना कर्म किये कोई उपाय नहीं है। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है कि बिना कर्म किये वो रह ही नहीं सकता है।
         इसे समझने के बाद ये समझना आवश्यक है कि हमें कौन सा कर्म किस प्रकार करना चाहिए। द्वितीय अध्याय में कर्मयोग की विस्तृत चर्चा करते हुए श्रीकृष्ण इसे समझा चुके हैं, पुनः उसी को दुहराते हुए समझाते हैं कि
1.हमें वो कर्म करना है जो अनिवार्य है। इसका निर्णय हम कैसे लें कि वो कौन से कर्म हैं जिनको करना ही है। इसके लिए आवश्यक है कि तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण की स्वयम में उपलब्धता के अनुसार अपना कर्म निर्धारित करें जो अनिवार्य है हमारे लिए। इसे ही श्रीकृष्ण पूर्व में स्वधर्म कह चुके हैं। जरूरी नहीं कि जो कर्म हमारे लिए अनिवार्य है वही दूसरे के लिए भी अनिवार्य हो। ये तो हमारे गुणों पर निर्भर करता है । 
2.दूसरी बात है कि हम कर्म को आसक्ति रहित होकर करें अर्थात कर्म करने में आनन्द देखें न कि उसके परिणाम में। यदि कर्म करना हमारे स्वभाव में ढल जाता है, यदि हम कर्म करने को ही स्वाभाविक गति समझ लेते हैं तो फिर हमें उस कर्म को करने में आनन्द आता है। परिणाम वाह्य है जो हमपर निर्भर नहीं करता। लेकिन कर्म तो हमारा है जिसे करना हमारे वश में है। जब हम ऐसा समझते हैं तो फिर हम कर्म करने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं । ऐसी स्थिति में कर्म करने में हमें श्रद्धा होती है और हम पूरे मनोयोग और समर्पण से कर्म करते हैं।
3.निर्धारित अनिवार्य कर्म करने के इस दृष्टिकोण को अपनाने से ही हमें परमगति की प्राप्ति होती है।

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