श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है
॥16॥
तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि यही एक तरीका है (जिसका वर्णन ऊपर किया गया है) जीवन जीने का। जो व्यक्ति कर्मपथ में यज्ञ की भावना से नहीं बढ़ता, कर्म नहीं करता, वैसा व्यक्ति हमेशा अपने इन्द्रियों के सुखों की पूर्ति में लगा रहता है, और सो माया, मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, जैसी भावनाओं में डूबा रहता है। इस तरह के व्यक्ति का जीवन जिसमें समर्पण , परमार्थ, त्याग नहीं होता, जिसमें नियत सृष्टि चक्र के साथ सामंजन नहीं होता नाकारात्मकता से यानी पाप से यानी काम, लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या आदि से अभिशप्त हुआ व्यर्थ होता है क्योंकि इससे न तो उस व्यक्ति का कल्याण होता है न ही समाज का।
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