श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 14 एवम 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 14 एवम 15
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
 यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
 कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
 तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है
 ॥14-15॥

हम देख चुके हैं कि व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति व्यक्ति के गुणों के अनुसार उससे कर्म करा ही लेती है। जिस प्रकार जीने के श्वास अनिवार्य शर्त है उसी प्रकार कर्म भी अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम सब जो कर्म करते हैं वे दो भावना से किये जाते हैं। कुछ लोग निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो कुछ सिर्फ स्वार्थ के अधीन ही कर्म करते हैं।
    निस्स्वार्थ कर्म क्या है? आप वृक्ष को देखें। इसमें विभिन्न अवयव होते हैं यथा तना, शाखाएँ, पत्ते, जड़, फल, फूल। लेकिन जब हम वृक्ष को देखते हैं तो हम ये नहीं कहते कि यह एक तना है, शाखा है, पत्ता है, जड़ है, फूल है या फल है। हम उसे वृक्ष कहते हैं।  उसी प्रकार निःस्वार्थ भाव के लोग संसार को , भौतिक और अभौतिक संसार को उसके अवयवों से नहीं देखते, बल्कि समग्र रूप से देखते हैं, वे UNIVERSE की तरह देखते हैं, MULTIVERSE की तरह नहीं। उनकी दृष्टि में भेद नहीं होता। जब आप इस प्रकार किसी चीज को एक यूनिट यानी इकाई के रूप में देखते हैं तो उसकी समग्र अच्छाई और उसके समग्र कल्याण को सोच समझ पाते हैं। अब देखें कि पत्ते खाना बनाते हैं , शाखाएँ उन्हें तना से होते हुए जड़ तक पहुँचाती हैं, तना वृक्ष को खड़ा रहने का अवलम्ब भी देते हैं, जड़ जमीन से पोषण लेकर ऊपर तना और शाखाओं से होते हुए पत्तों तक पहुँचाती हैं ताकि वृक्ष का भोजन बन सके, फूल फल को जन्म देने में सहायक होते हैं और फल उस बीज को धारण करते हैं जिनसे पुनः एक नया वृक्ष जन्म लेता है। अब जरा सोचिए कि क्या किसी एक अंग का कार्य अपने आप में पूरा है? क्या कोई एक अंग का अलग से कोई अस्तित्व है? और क्या एक अंग के नहीं रहने से उस वृक्ष का कोई अस्तित्व है? दोनों के उत्तर नकारात्मक हैं।  दोनों अपने अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। जो इंसान ये सच जान समझ कर बिना अपने स्वार्थ के पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करता है वह  निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहता है और व्यवस्था उसका भरण पोषण करते रहती है। लेकिन यदि वृक्ष का कोई अंग बेईमानी करे और अपना काम सिर्फ अपने लिए करे , अन्य को अपने कर्म का परिणाम आगे नहीं बढ़ाये तो क्या होगा, मसलन जड़ पोषण तो इकठ्ठा करे लेकिन आगे शाखा और पत्तों तक नहीं जाने दे तो क्या होगा? प्रारम्भ में जड़ मोटा तगड़ा होगा , लेकिन पत्ते उस पोषण को अप्राप्त रहने की स्थिति में वृक्ष का भोजन नहीं बना पाएंगे और धीरे धीरे सारा वृक्ष कमजोड़ होकर गिर जाएगा। यही स्वार्थवश किया गया कर्म है।  यही दृष्टांत समाज में हर जगह लागू होता है। सो हमें निःस्वार्थ भाव से उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म करना होगा, अन्यथा हम और हमारी व्यवस्था क्षीण होकर गिर जाएगी। यही हमारा पाप है। यही लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, आदि पाप हैं हमारे जो हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। यही निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म यज्ञ है।
  इस यज्ञभावना को स्मरण रखते हुए  श्रीकृष्ण की शिक्षा को समझने के लिए हम आगे बढ़ते हैं तो समझते हैं कि परमपिता परमेश्वर ही सर्वज्ञानी होता है, और उसी से ज्ञान की सरिता बहती है। ये हमेशा ध्यान रखने की बात है कि ज्ञान से ही कर्म की उत्पत्ति होती है। जब हमारे अंदर ज्ञान की भावना होती है तो हमारे कर्म यज्ञ भावना से संचालित होते हैं। यज्ञभावना से किये गए कर्म अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं जिनसे इक्षित व्यस्तुओं जिनसे हमारा भरण पोषण हो सकता है उत्पन्न होते हैं। यदि कर्म ज्ञान आधारित न हों, स्वेक्षाचार से संचालित हों तो फिर उनमें यज्ञ भावना नहीं हो सकती और बिना यज्ञ भावना के हमारा भरण पोषण करने वाले इक्षित फल भी अप्राप्त रहेंगे। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म की यज्ञभावना में ईश्वर का वास है।
प्रत्येक कार्य क्षेत्र में उपभोग्य लाभ होता है जो उस कार्य क्षेत्र का अन्न है जिसमें भरण पोषण करने की क्षमता होती है। यह उपभोग्य लाभ तभी प्राप्त होता है जब उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हों यह अनुकूल परिस्थिति ही वृष्टि होती है जो निःस्वार्थ त्याग और सेवाभाव से किये गए स्वदाव्यित्व निर्वहन वाले कर्मों से सम्भव हो पाता है। यही कर्म यज्ञ हैं। जब परिस्थिति अनुकूल होती है तो उस कार्यक्षेत्र के उपभोग्य लाभ प्राप्त होते हैं जो उस कार्य क्षेत्र में लगे व्यक्तियों को उनके इक्षित फल प्रदान करते हैं यानी उनका भरण पोषण करते हैं।
     अब आइये इसे थोड़ा और विस्तार से समझें। जब हम किसी तंत्र को पूरी तरह से जानते समझते हैं तभी हम तय कर सकते हैं कि उस तंत्र के लिए क्या सही है क्या गलत है। इसी प्रकार संसार की पूरी समझ जब होती है तभी ज्ञात हो पाता है कि संसार के लिए क्या उचित है, क्या अनुचित है।  चेतना (consciousness) ही ज्ञान है। कोई वस्तु या पदार्थ उपलब्ध है, कोई जानकारी उपलब्ध है ये तबतक हमारे लिए अर्थहीन है जब तक उसकी चेतना यानी उसके सम्बन्ध में हमें consciousness नहीं है। यही चेतना ब्रह्म है, वेद है। हमें नित्य होने वाले परिवर्तनों की चेतना होती है। सूक्ष्म परिवर्तनों की भी चेतना हमें होती है। परिवर्तनों को वही चेतना समझ सकती है जो स्वयम अपरिवर्तनशील हो। यदि वह चेतना भी खुद परिवर्तनशील है तो फिर होने वाले परिवर्तनों को वह चेतना समझ पाने में सक्षम नहीं हो सकती। इसी कारण यह ब्रह्म अपरिवर्तनशील, और क्षरनरहित यानी अक्षर है। और यही अक्षर हमारा अपना सेल्फ है, अपनी आत्मा है। इसी चेतना से कर्म करने की क्षमता उत्पन्न होती है। कर्म करने की क्षमता सभी में होती है। लेकिन सभी कर्मों से सकारात्मकता नहीं उत्पन्न होती। जब कर्म निःस्वार्थ भाव से किये जाते हैं , जब उनमें अन्य के कल्याण की भावना होती है, जब अन्य के लिए समर्पण और त्याग की भावना होती है तो उस कर्म को यज्ञ की संज्ञा दी जाती है। इस यज्ञ भावना के कारण ही हमारे बन्धन खत्म हो पाते हैं। जब हम अन्य के प्रति समर्पित होकर, उसके लिए त्याग की भावना से कर्म करते हैं तो हम खुद की परिधि से बाहर निकल कर जीने लगते हैं। हमारे समर्पण और त्याग की सीमा जितनी बड़ी होती है हम खुद से बाहर निकल कर उतनी दूरी तक विस्तारित होते हैं। स्वार्थ के कारण हम I , ME,  & MY से बाहर नहीं निकल पाते। हम खुद के शरीर से बन्धें रहते हैं। लेकिन जब हम सेवा, त्याग और समर्पण की भावना से कर्म करते हैं तो हमारे सेल्फ का विस्तार हमारे अपने अस्तित्व से बाहर जाकर होता है, हम खुद से बाहर निकल कर परिवार, समाज, देश और पूरे संसार तक फैल सकते हैं। हम अपने बन्धनों से बाहर निकल जाते हैं। यही भवना यज्ञ की भावना है। इसी भावना से वृष्टि होती है यानी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अनुकूल परिस्थिति ही वृष्टि है जो अन्न उत्पादन को सम्भव करती है। अन्न वो वस्तु है जिसका हम उपभोग करते हैं। जब समाज से सदस्य इस यज्ञ भावना से कार्य करते हैं अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं, जिनके कारण समाज इक्षित व्यस्तुओं और परिणामों को जन्म दे पाता है जो उसके सदस्यों के लिए इक्षित होते हैं। अतएव व्यक्ति और समग्र तंत्र के विकास के लिए ये जरूरी है कि सभी व्यक्ति इस यज्ञ भावना से कर्म करें, इसी TEAM SPIRIT से कार्य करें। इससे उत्पादन होता है। जितनी अधिक यज्ञ भावना होगी उतनी ही अनुकूल स्थिति होगी और उत्पादन क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी और परिणाम में तंत्र के सदस्यों का भरण पोषण भी उतने  ही अच्छे तरह से होगा। इस प्रकार ही कर्मों से तंत्र का विकास होता है और तंत्र बदले में हमारा विकास करता है। ये भरण पोषण भौतिक और आध्यात्मिक सभी तथ्यों पर लागू होता है। इससे स्पष्ट है कि ब्रह्म यानी SUPREME REALITY इस यज्ञ भावना में ही वास करता है। जब हम कर्म, कर्म के परिणाम और अंततः स्वयम को SUPREME REALITY के प्रति समर्पित कर देते हैं तो बदले में हम उस ब्रह्म यानी SUPREME REALITY को प्राप्त करते हैं। ये ठीक उसी प्रकार होता है जैसे वर्षा की बूंद अगर सागर में गिरती है तो सागर बन जाती है, गंगा में गिरती है तो गंगा बन जाती है। इसी प्रकार यदि हम खुद को जिस त्याग और समर्पण की भावना से समर्पित करते हैं उसी रूप में खुद को पाते हैं। यदि हम सम्पूर्णता से अपने को, अपने ईगो को परम के प्रति यानी TOTAL REALITY के प्रति समर्पित करते हैं तो बदले में हम परमब्रह्म यानी TOTAL REALITY ही पाते हैं। हमारा समर्पण, हमारा त्याग ही तय करता है कि हमारी उपलब्धि क्या होगी। इस भावना से कर्म करने पर हम स्वयम को, स्वयम के सेल्फ को समझ पाते हैं और ब्रह्म में अधिष्ठापित हो पाते हैं। इस स्थिति में हम बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार कर्म ही यज्ञ बनकर हमें कर्मबन्धनों से मुक्त करता है। 

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