श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 12 , 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 12 , 13

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
 तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥

यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है
 ॥12॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
 भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌॥

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं
 ॥13॥
       श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि यज्ञ भावना से व्यक्ति किस तरह लाभान्वित होता है। जब हम सम्पूर्ण समर्पण से, बिना परिणाम की अपेक्षा किये, अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं तो दैवी सम्पदाओं में तो उन्नति होती ही है साथ ही कर्म के मार्ग में कर्म की उतपादक क्षमता भी बढ़ती है जिससे वो व्यक्ति भी जो कर्म में क्रियाशील है वो भी लाभान्वित होता है। व्यक्ति जब सामूहिक हित की वृद्धि में अपना योगदान देता है तो वही सामूहिक हित व्यक्ति के हित का ख्याल कर उसकी पूर्ति भी करता है। लेकिन समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना सामूहिक हित, बिना दैवी सम्पदाओं की उन्नति में अपना योगदान दिए सामूहिक हित के लाभों का उपभोग भी करना चाहते हैं। ऐसे लोग चोर हैं। बिना अपने हिस्से का दायित्व निभाये, बिना कर्म किये जो चाहता है कि उसकी उन्नति हो , उसका भला हो, उसका प्रयोजन सिद्ध हो वो व्यक्ति दूसरे के हिस्से को मारता है सो वह निश्चित ही चोर है। इस प्रकार दैवी सम्पद यानी उत्पादन क्षमता का त्याग और समर्पण की भावना पर आधारित कर्म द्वारा पोषण होता है जिससे उनमें वृद्धि होती है  और बदले में उस उत्पादन क्षमता यानी दैवी सम्पदाओं में हुई वृद्धि से समाज की इकाई के रूप में उस व्यक्ति की भी वृद्धि होती है।  यदि कोई व्यक्ति सामूहिकता के इस सिद्धान्त को तोड़कर ये चाहे कि इस कॉमन गुड में वो अपना योगदान भी न दे यानी उस कॉमन गुड़ के प्रति अपना निर्धारित कर्म भी न करे और कॉमन गुड़ से होने वाले लाभ का फायदा भी उठाए तो फिर वह व्यक्ति तो चोर ही  कहलायेगा न!  समाज का वह व्यक्ति जो बिना उत्पादन किये समाज की सपंत्ति का उपभोग करे वो व्यक्ति निश्चित रूप से समाज का अपराधी भी है और समाज पर बोझ भी है। इस तरह के व्यक्ति के अंदर नाकारात्मक प्रवृत्तियाँ, अंधकार , आदि की ही वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति समाज के हित को दरकिनार कर सिर्फ अपने बारे में सोचता है। जो सिर्फ अपने हित की वृद्धि की बात सोचता है वह व्यक्ति निरन्तर समाज की उपेक्षा करता है, वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का दमन करता है और इस प्रकार वह सिर्फ अपने पाप को ही बढ़ाता है।
   लेकिन इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने हिस्से का कर्म कर उस कर्मफल को प्रसाद की तरह लेता है वही श्रेष्ठ होता है क्योंकि वह सम्पूर्ण सामाजिक हित में अपना योगदान देकर उनसे प्राप्त फल को प्रसाद की तरह पाता है। हम जो अर्पित करते हैं बदले में भी वही पाते हैं। जो हम हम अर्पित करते हैं वही  कर्म अर्पण के पश्चात प्रसाद कहलाते हैं और वही हमें बदले में मिलते भी हैं।  जो व्यक्ति अपने हिस्से के कर्म को पूर्ण समर्पण की भावना से उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर करता है उसे जो फल प्राप्त होता उसे वह प्रसाद की तरह लेता है और उस स्थिति में उसे पूर्ण मानसिक शांति की प्राप्ति होती है जिसके कारण उसकी यात्रा अपने पूर्णता की तरफ होती है। वह पूर्ण संतोष को, पूर्ण प्रसन्नता को प्राप्त होता है।  लेकिन इसके विपरीत जो सिर्फ अपने लाभ के विषय में सोचता है, भले इससे लोगों का अनिष्ट होता रहे तो वह व्यक्ति पाप यानी अशुद्धि यानी गन्दगी ही पकाता और खाता है अर्थात उसके अंदर सिर्फ और सिर्फ अशुद्धि यानी गंदगी का ही विकास होता है, आसुरी सम्पदाओं की ही वृद्धि होती है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को हम सारांश में इन सोपानों में समझ सकते हैं--
1.व्यक्ति को निश्चित ही अपना कर्म करना चाहिए।
2. उसे अपने हिस्से का कर्म करना चाहिये।
3.उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पण की भावना से कर्म करने चाहिए।
4. उसे कर्म करते समय सिर्फ अपने लाभ के विषय में न सोचकर समस्त व्यवस्था के वृद्धि के विषय में सोचना चाहिए, यानी स्वार्थ नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से कर्म करने चाहिए।
5.जब व्यक्ति इस तरह से कर्म करता है तो उसे जो मिलता है वह वही होता है जिससे सामूहिक हित का पोषण होता है। इसी पोषण से उसका भी पोषण होता है।
6.इस तरह व्यक्ति को पूर्ण संतुष्टि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार का सन्तुष्ट व्यक्ति परम् शांति और सुख को प्राप्त करता है।
7. जो ऐसा नही कर सिर्फ अपनी भलाई की सोचता है वह व्यक्ति समाज के सामूहिक हित का अहित कर अपना लाभ बढाना चाहता है।  इस प्रकार के व्यक्ति के अंदर नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा दूसरों को दुख देने, उनका हक मारने, दूसरों से धोखाधड़ी करने, दूसरों से दुर्व्यवहार करने, उनसे झूठ बोलने,की वृद्धि होती है।
8. जो हम उच्च आदर्शों को समर्पित करते हैं वही हमें प्रसाद के रूप में प्राप्त होता है। सो हमें चाहिए कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करें ताकि हमें जो मीले वो भी सर्वश्रेष्ठ हो। 
9. इस प्रकार जब हम ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्म करते हैं, जब हम उच्च आदर्शों के प्रति  समर्पित होकर कर्म करते हैं, जब हम निस्वार्थ भाव से सामूहिक कल्याण और सामूहिक वृद्धि की भावना से कर्म करते हैं तो प्रसाद में भी उन्नति ही हमें मिलती है। लेकिन यदि हम स्वार्थवश होकर कर्म करते हैं , सिर्फ अपने हित को साधने के लिए दूसरों को कष्ट देने के उद्देश्य से कर्म करते हैं तो हमें बदले में वही अहितकारी, नाकारात्मक , चीजें प्राप्त होती हैं जिससे हम निरन्तर असन्तुष्ट ही रह जाते हैं, बेचैन ही रह जाते हैं।
10. जो व्यक्ति बिना समाज के व्यापक हित में योगदान दिए सिर्फ अपना ही हित साधने के चक्कर में रहता है वह सिर्फ अशुद्धि को यानी नाकारात्मकता यानी आसुरी सम्पदाओं जैसे लोभ, मोह, क्रोध, छल, हिंसा, आदि को बढ़ाता है।
     हम देख चुके हैं कि व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति व्यक्ति के गुणों के अनुसार उससे कर्म करा ही लेती है। जिस प्रकार जीने के श्वास अनिवार्य शर्त है उसी प्रकार कर्म नही अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम सब जो कर्म करते हैं वे दो भावना से किये जाते हैं। कुछ लोग निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो कुछ सिर्फ स्वार्थ के अधीन ही कर्म करते हैं।
    निस्स्वार्थ कर्म क्या है? आप वृक्ष को देखें। इसमें विभिन्न अवयव होते हैं यथा तना, शाखाएँ, पत्ते, जड़, फल, फूल। लेकिन जब हम वृक्ष को देखते हैं तो हम ये नहीं कहते कि यह एक तना है, शाखा है, पत्ता है, जड़ है, फूल है या फल है। हम उसे वृक्ष कहते हैं।  उसी प्रकार निःस्वार्थ भाव के लोग संसार को , भौतिक और अभौतिक संसार को उसके अवयवों से नहीं देखते, बल्कि समग्र रूप से देखते हैं, वे UNIVERSE की तरह देखते हैं, MULTIVERSE की तरह नहीं। उनकी दृष्टि में भेद नहीं होता। जब आप इस प्रकार किसी चीज को एक यूनिट यानी इकाई के रूप में देखते हैं तो उसकी समग्र अच्छाई और उसके समग्र कल्याण को सोच समझ पाते हैं। अब देखें कि पत्ते खाना बनाते हैं , शाखाएँ उन्हें तना से होते हुए जड़ तक पहुँचाती हैं, तना वृक्ष को खड़ा रहने का अवलम्ब भी देते हैं, जड़ जमीन से पोषण लेकर ऊपर तना और शाखाओं से होते हुए पत्तों तक पहुँचाती हैं ताकि वृक्ष का भोजन बन सके, फूल फल को जन्म देने में सहायक होते हैं और फल उस बीज को धारण करते हैं जिनसे पुनः एक नया वृक्ष जन्म लेता है। अब जरा सोचिए कि क्या किसी एक अंग का कार्य अपने आप में पूरा है? क्या कोई एक अंग का अलग से कोई अस्तित्व है? और क्या एक अंग के नहीं रहने से उस वृक्ष का कोई अस्तित्व है? दोनों के उत्तर नकारात्मक हैं।  दोनों अपने अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। जो इंसान ये सच जान समझ कर बिना अपने स्वार्थ के पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करता है वह  निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहता है और व्यवस्था उसका भरण पोषण करते रहती है। लेकिन यदि वृक्ष का कोई अंग बेईमानी करे और अपना काम सिर्फ अपने लिए करे , अन्य को अपने कर्म का परिणाम आगे नहीं बढ़ाये तो क्या होगा, मसलन जड़ पोषण तो इकठ्ठा करे लेकिन आगे शाखा और पत्तों तक नहीं जाने दे तो क्या होगा? प्रारम्भ में जड़ मोटा तगड़ा होगा , लेकिन पत्ते उस पोषण को अप्राप्त रहने की स्थिति में वृक्ष का भोजन नहीं बना पाएंगे और धीरे धीरे सारा वृक्ष कमजोड़ होकर गिर जाएगा। यही स्वार्थवश किया गया कर्म है।  यही दृष्टांत समाज में हर जगह लागू होता है। सो हमें निःस्वार्थ भाव से उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म करना होगा, अन्यथा हम और हमारी व्यवस्था क्षीण होकर गिर जाएगी। यही हमारा पाप है। यही लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, आदि पाप हैं हमारे जो हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। यही निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म यज्ञ है।

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