श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 11
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 11
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
॥11॥
अब श्रीकृष्ण मनुष्य और उन गुणों जो मनुष्य का उत्थान करते हैं उनके बीच के परस्पर सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए उनके महत्व पर प्रकाश डालते हैं। देव् क्या है? क्या देवता परम् ईश्वर से भिन्न कोई सत्ता होता है? नहीं । परमब्रह्म एक ही है लेकिन उसकी अभिव्यक्ति भिन्न भिन्न तरह से होती है। यही अभिव्यक्ति देव या देवता है जो भिन्न भिन्न गुणों यानी दैवी गुणों से प्रकट होकर व्यक्ति को प्रखर करती है, प्रकाशित करती है। दैवी गुण ही देवता हैं। जब व्यक्ति इन गुणों यानी इन देवताओं की शरण में जाकर उनके प्रति समर्पित होता है तो ये गुण बढ़ते हैं, समृद्ध होते हैं और साथ ही साथ ये व्यक्तियों का भी उत्थान करते हैं। ये परस्पर होता है। यदि हम खुद की बौद्धिकता को तराशते हैं , उनको माँजते हैं तो उनकी चमक, उनकी धार हमें प्रकाशित करती है, हमें धार प्रदान करती है। एक की वृद्धि दुसरे की भी वृद्धि सुनिशित करती है। बिना इसके व्यक्ति के उत्थान की कल्पना भी नहीं है। यही तो यज्ञभावना है।
यज्ञ की भावना क्या है? हम पीछे देखते हैं कि परस्पर उन्नति की भवना ही यज्ञभावना है, यानी निःस्वार्थ भाव से दूसरे की सेवा करना ही यज्ञ भावना है। जब सहयोग और अनुशासन में रहकर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म में प्रवृत्त होते हैं तो पूरे मनोयोग से उसे करते हैं और यही तो उस कर्म की उत्पादन क्षमता भी होती है जो प्रकट होकर हमारी समृद्धि को बढ़ाती है। इसके विपरीत यदि हम तुक्ष आसक्ति भाव से खुद के लिए जब कार्य करते हैं जिसमें समष्टि के प्रति कोई समर्पण नहीं होता है तो हमारे कर्म से उन महान उद्देश्यों का भला नहीं हो पाता, उसकी उत्पादन क्षमता गिर जाती है, उन सद्गुणों का जो उन कर्मों की धार होते हैं उनमें वृद्धि नहीं हो पाती और नतीजा में कर्म निष्फल होकर रह जाते हैं, उनसे दैवी सद्गुणों का विकास नहीं होता जिसके परिणाम स्वरूप न तो व्यक्ति का न ही समष्टि का ही कल्याण हो पाता है। व्यक्ति जिस हद तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर कर्म करता है उस हद तक व्यक्ति और समाज का पतन होता है। सो ये जरूरी है कि हम उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर कर्म करें। जब हम उच्च आदर्श को अपना लक्ष्य मानकर , उस आदर्श की सेवा करते हैं , उसके प्रति ही समर्पित होते हैं तो वही आदर्श हमारा कल्याण करता है। यह व्यक्ति के लिए सही है, तो साथ साथ व्यक्तियों के समूहों, संगठनों , समाज के लिए भी सही है। सम्पूर्ण हार्मोनी ही उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है। व्यक्ति मैं नहीं हम की भावना से चलती है। यदि किसी संगीत समारोह में सभी वादक अपना अपना साज अपनी अपनी इक्षा से बजाने लगे तो सिर्फ और सिर्फ शोर पैदा होता है लेकिन यदि एक राग विशेष के लिए सभी उस राग को जन्म देने के उद्देश्य से साजों को बजाते हैं तो मधुर संगीत निकलता है। साजों की हार्मोनी से राग बनते हैं न कि जबरन साजों का महत्व साबित करने के लिए उनको लगातार बजाने से। प्रत्येक व्यक्ति यदि खुद से अधिक दूसरे के महत्व को तवज्जो देता है तो इस हार्मोनी की पैदाइश होती है। इस प्रकार यज्ञ भावना एक सामूहिक प्रयास है उच्च आदर्शों के प्रति और यही उच्च आदर्श पूर्ण होकर व्यक्ति का कल्याण करता है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह इन दैवी सद्गुणों का विकास करे जो अंततः उस व्यक्ति को उसके परमलक्ष्य की प्राप्ति को सम्भव करता है। सो हमें चाहिए कि हम इस संसार के साथ हार्मोनी यानी सजातीय प्रवृत्तियों , उन प्रवृत्तियों जिनसे यज्ञ भावना बलवती होती है उनके साथ हार्मोनी में रहें।
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