श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 1
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 1
ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
॥1॥
उक्त पृष्टभूमि से स्पष्ट है कि जब हम कुछ सीखते जानते हैं तो उसे सहजता से उसी रूप में नहीं स्वीकारते जिस रूप में वो चीज, कला या ज्ञान हमें प्राप्त होता है। बल्कि हम उसे भी अपने पूर्वग्रहों के अनुसार ही लेते हैं, समझ पाते हैं। हमारे मन मस्तिष्क में पूर्व से कुछ विचार होते हैं और हम प्राप्त होने वाले ज्ञान को अपने उसी विचार के अनुरूप ढाल कर लेते हैं। नतीजा होता है कि जितना हमें सीखने को मिल पाता है वो सब हम सीख नहीं पाते और सीखे हुए ज्ञान को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार ही ग्रहण करते हैं। अर्जुन युद्धक्षेत्र में आते ही अवसाद का शिकार हो जाता है और युद्ध नहीं करने का निर्णय ले लेता है। यह निर्णय वह अपने पूर्वसंचित ज्ञान के अनुसार लेता है और जब उसी के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे सन्मार्ग की शिक्षा देते हैं तो उसके पुरसंचित ज्ञान ही उसका पूर्वाग्रह बन उसे श्रीकृष्ण की शिक्षा को हु ब हु प्राप्त करने से रोकते हैं। इसीलिए तृतीय अध्याय के शुरुआत में ही अर्जुन प्रश्न कर देता है कि जब श्रीकृष्ण की शिक्षा के अनुसार ही ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो फिर श्रीकृष्ण उसे युद्ध जैसे भयंकर कर्म करने के लिए भला क्यों कहा रहें हैं। स्मरण रहे कि अर्जुन पूर्व में ही युद्ध नहीं करने की ठान चुका है सो जब श्रीकृष्ण उसे शिक्षा दे रहे होते हैं तो वह सुनता तो सब है लेकिन याद रखता है अंश मात्र ही। उसे ये तो याद है कि ज्ञान श्रेष्ठ है लेकिन ये स्मरण नहीं कि इसकी प्राप्ति का मार्ग निष्काम कर्मयोग है। ऐसा नहीं कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात सुनी नहीं बल्कि ऐसा है कि उसे श्रीकृष्ण की शिक्षा में वही बात अच्छी तरह से याद रही जो उसके तर्कों का साथ दे सकती थी। उसे बल मिला कि जब श्रीकृष्ण के अनुसार ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो उसका कर्म यानी युद्ध नहीं करने का निर्णय सही साबित हो सकता है। अब देखिए मजे की बात कि द्वितीय अध्याय में श्री कृष्ण ने कँही ये नहीं कहा कि ज्ञान मार्ग श्रेष्ठ है या निष्काम कर्मयोग योग का मार्ग श्रेष्ठ है, बल्कि उन्होंने ये समझाया कि परम् सिद्धि जो परम् ज्ञान प्राप्ति की अवस्था है वो तो निष्काम कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ही प्राप्त हो सकता है लेकिन चुँकि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था सो वो पूरे वार्तालाप और प्राप्त शिक्षा को अपने पूर्वाग्रह कि युद्ध नहीं करना है, कर्म नहीं करना है , के अनुसार ही लेता है।
हम सभी हर क्षण यही करते हैं जो अर्जुन युद्ध भूमि में कर रहा है। एक ही वर्ग में पढ़ने वाले छात्र एक ही शिक्षक की एक ही बात को अपने अपने अनुसार लेते सीखते हैं। जीवन में जब भी कोई बात होती है हमारा मन अपने पसन्द(LIKE) और अपने अच्छाई के बीच में से पसन्द को सिर्फ इसलिए चुनता है क्योंकि वह उसके पूर्वाग्रह को समर्थन देता है और तार्किक बातों को जी उसका हित कर सकने में सक्षम होते हैं उनको इसलिए नहीं अपना पाता क्योंकि वह अपने पूर्वाग्रह से बाहर ही नही। आना चाहता।
Comments
Post a Comment