अध्याय 3 श्लोक 1 से 10 की व्याख्या

अध्याय 3 श्लोक 1 से 10 की व्याख्या

                      पृष्ठभूमि

महाभारत के युद्ध के पूर्व पांडवों ने अपना साम्राज्य कौरवों के हाथों गँवा दिया था। यूँ कहें कि करवों ने दुर्योधन के नेतृत्व में धृतराष्ट्र की मौन स्वीकृति से छल से पांडवों का साम्राज्य, उनका उस समय के अनुसार से प्रचलित कानूनी हक छीन लिया था, पांडवों की पत्नी का भरी सभा में घोर अपमान किया था, तथा पांडवों की छल से हत्या की कोशिश भी की थी। श्रीकृष्ण के सभी शांति प्रस्ताव विफल हो गए थे। तब पांडवों ने युद्ध का विकल्प चुना था। लेकिन युद्ध क्षेत्र में पहुँच कर पांडवों का सबसे प्रमुख योद्धा अर्जुन विषादग्रस्त हो गया। कारण? युद्ध क्षेत्र में जब अर्जुन ने देखा कि उसके पितामह, उसके गुरु, उसके कुलगुरु, उसके भाई एवम अन्य बंधु बाँधवगण, उसके मित्र खड़े हैं तो वो विचलित हो गया। ऐसा नहीं कि अर्जुन को प्रथम बार पता चला हो कि कौन कौन उसके कष्ट के कारण रहें हैं, कौन कौन उसके विरुद्ध युद्ध में उतरेंगे। लेकिन युद्धक्षेत्र में सभी विरोधियों को समवेत देख कर वो घबड़ा गया। उसकी घबड़ाहट पराजय के भय से नहीं थी। अर्जुन अपने युग के महानतम योद्धाओं में शुमार था, साथ ही बहुत विद्वान भी था। इसीलिए उसे युद्ध की सम्भावित विभीषिका और सम्भावित परिणामों की चिंता सताने लगी। और उसकी यही चिंताएँ उसके मानसिक अवस्था पर भारी पड़ीं जिससे वो व्यथित हो गया , और युद्ध नहीं करने का फैसला कर लिया । लेकिन ये भी सच है कि अर्जुन पूरी तरह से अपने निर्णय से आश्वस्त भी नही था, सो वह अपने सबसे प्रिय मित्र श्रीकृष्ण को अपनी मनःस्थिति बताकर उनसे मागदर्शन मांगा।

इस पूरी कहानी में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है, कुछ भी अतिरेक नहीं है। हम सभी इसी दौर से जीवन में गुजरते हैं। हम सभी अपने परिस्थितियों के सम्बंध में ऐसे ही दिग्भ्रमित होते हैं। अपने तात्कालिक ज्ञान के आधार पर हम अपनी परिस्थितियों की समीक्षा करते हैं, एक ही समय में अपनी समीक्षा को सर्वश्रेष्ठ भी मानते हैं और उसपर अविश्वास भी करते हैं, चाहते हैं कि हमारे मित्रादि हमारे निर्णय को समर्थन दें, सो उनसे अपनी समीक्षा और निर्णय साझा भी करते हैं। मजे की बात की सैद्धान्तिक तौर पर हम जानते हैं कि क्या सही और क्या गलत हो सकता है, लेकिन जैसे खुद व्यवहार के धरातल पर उतरते हैं हमारी सैद्धान्तिक बुद्धि मार खा जाती है और हम विषम परिस्थिति से बचने के लिए कुतर्क कर कोई आसान रास्ता ढूंढते है, अपने तर्कों को वजनी बनाने के लिए धर्म, परम्परा, आदर्श, लोक-परलोक, त्याग, ज्ञान, बलिदान आदि की दुहाई भी देते हैं और चाहते हैं कि हमारे इष्ट और मित्र हमारे तर्क का समर्थन करें। हम सभी हु ब हु यही करते हैं और अर्जुन भी यही करता है।

      लेकिन अर्जुन के परम मित्र श्रीकृष्ण अर्जुन के मत को समर्थन नहीं देते और उसे वो मार्ग बताते हैं जो सभी अवस्थावों में अनुकरणीय है। श्रीकृष्ण भी यदि अर्जुन की ही तरह होते तो दो में से एक विकल्प चुनते। या तो अर्जुन को समर्थन दे कर युद्ध की विभीषिका और सम्भावित परिणाम के कारण युद्ध छोड़ कर धुनि रमाने को कहते या फिर उसे उसके कुल खानदान, उसकी माँ और पत्नी पर कौरवों के द्वारा किये गए अत्याचार की याद दिलाकर उसे उकसाते, युद्ध के लिए प्रेरित करते। लेकिन श्रीकृष्ण ऐसा कुछ नहीं कर रहें हैं, उल्टे उसे युद्ध क्षेत्र में आत्मा की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग समझाने लगते हैं। सामान्य बुद्धि व्यक्ति के लिए श्रीकृष्ण का यह व्यवहार एकदम समयानुकूल नहीं है। कुछ को तो ये भी लग सकता है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध से निकलने का कोई सुगम और आदर्शवादी मार्ग बता रहें हैं ताकि अर्जुन युद्ध के मारकाट को छोड़कर भजन करने निकल भी जाये और उसपर युद्ध से भागने का कलंक भी न लगे। खुद अर्जुन को भी यही भ्रम हो जाता है। हम सभी जिनको ये पता नहीं कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है यही लगता है। जब भी हम किसी परेशानी में पड़ते हैं हम या तो उस परेशानी का सामना बदले की भावना से करते हैं या फिर रामनाम की दुहाई देकर निकल लेते हैं। हम जो सुनते हैं उसे अपने तात्कालिक ज्ञान के अनुसार ही समझ पाते हैं सो हमारी पहली प्रतिक्रिया भी प्राप्त हो रहे सुझाव के अनुरूप नहीं हो पाती। यदि हमें कोई मार्ग सूझता है तो हमारी पहली प्रतिक्रिया उस सुझाव पर अपने तत्कासलिक ज्ञान के अनुसार होती है ।।श्रीकृष्ण जब अर्जुन को जीवन के लक्ष्य को बताते हुए उसे आत्मसाक्षत्कार यानी सेल्फ की प्राप्ति और उस प्राप्ति का मार्ग बताते हैं तो अर्जुन उनकी बातों में उसी बात को पकड़ता है जो उसके मनोकुल है यानी वो खुश होता है कि ज्ञान अर्जित कर लो हो गया काम। हम सुधि पाठक और श्रोतागणों को भी यही लग सकता है कि भगवान भी तो युद्ध का समर्थन नहीं करते हैं वो तो ज्ञान अर्जित कर मोक्ष को ही परम बताते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि न तो अर्जुन और न हम सभी श्रीकृष्ण की बातों पर समग्र रूप से ध्यान दे पाते हैं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के कारण श्रीकृष्ण की शिक्षा को अपने तात्कालिक ज्ञान(आज्ञान) के अनुसार ही समझ पाते हैं। यही कारण है कि जब व्यथित, विषादयुक्त, दिग्भ्रमित अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे ज्ञान की शिक्षा देते हैं, उसे सही मार्ग समझाते हैं तो अर्जुन सुनता तो सब है किंतु अपने पूर्वाग्रहों के कारण उन बातों को समग्र रूप से नहीं समझ कर उन शिक्षाओं को अपने पसन्द के अनुसार लेता है। श्रीकृष्ण की शिक्षा से स्पष्ट है कि हमें वो नहीं करना है जो हमारा LIKE (पसन्द) है बल्कि वो करना है जो RIGHT(सही/सत्य) है। किंतु अर्जुन अभी भी LIKE पर अटका हुआ है , हम सभी सारी बात को , सारे सत्य को जानते हुए भी अपने अपने LIKE पर ही अटके रहते हैं सो अर्जुन भी और हमसभी भी अपने आसक्ति को ही सत्य मानकर उसे सही ठहराने की कुचेष्टा करते हैं।

         इसी पृष्ठभूमि में अर्जुन अपनी शंका को व्यक्त करता है। अर्जुन की शंका के साथ ही तृतीय अध्याय की शुरुआत होती है । अर्जुन की मनःस्थिति युद्ध विरोधी नहीं है बल्कि युद्ध यानी स्वधर्म से पलायनवादी है। विरोध और पलायन अलग अलग होते हैं। लेकिन पलायन को सही साबित करने के लिए हम सब और अर्जुन भी पलायन के साथ तर्क और धर्म जोड़कर उसे सही साबित करने की कोशिश करते हैं। द्वितीय अध्याय के पठन पाठन और श्रवण के अंत में हमें लग सकता है कि कर्म से बन्धन बढ़ता है। एक कर्म अगली वसना, एक कामना यानी इक्षा को जन्म देती है जिसे पूरा करते करते अगली वासना जन्म ले चुकी होती है और फिर कर्म। अगर ऐसा है तो फिर बन्धन से मुक्ति, वैराग,सन्यास और मोक्ष कैसे मिल सकता है और यदि अंतिम लक्ष्य मुक्ति, वैराग्य, सन्यास और मोक्ष ही हैं तो फिर कर्म करने से क्या लाभ। हालांकि श्रीकृष्ण बता चुके हैं कि यह स्थिति कर्म करके ही प्राप्त हो सकती है लेकिन हम सब तो पलायन की मानसिकता में जी रहें हैं सो अपने इस पूर्वाग्रह के कारण छोर पकड़ कर कुतर्क करते रहते हैं कि हमारा काम तो कर्म करना नहीं भजन करना भर है। कुछ और विज्ञ जन एक कदम आगे बढ़कर श्रीकृष्ण के माथे ही दोष मढ देते हैं कि उन्होंने ही तो सन्यास की प्राथमिकता साबित कर हमें कर्म से विमुख कर दिया है।

    अर्जुन भी इसी श्रेणी में है। सो वो प्रश्न दागता है। तब श्रीकृष्ण को लगता है कि इसके पल्ले कुछ पड़ा नहीं और तब वे अपनी पूर्व की शिक्षा को विस्तार से समझाते हैं, नतीजा कि अर्जुन 18वे अध्याय के अंत में जाकर समझ पाता है कि उसे करना क्या है। 

     तो हम सभी इसी पृष्ठभूमि में श्रीमद्भागवद्गीता के अध्ययन में तृतीय अध्याय  में प्रवेश करते हैं। इस अध्याय में कुल 43 श्लोक हैं जिनका अध्ययन हम यथासम्भव श्लोकवार करेंगे।
उक्त पृष्टभूमि से स्पष्ट है कि जब हम कुछ सीखते जानते हैं तो उसे सहजता से उसी रूप में नहीं स्वीकारते जिस रूप में वो चीज, कला या ज्ञान हमें प्राप्त होता है। बल्कि हम उसे भी अपने पूर्वग्रहों के अनुसार ही लेते हैं, समझ पाते हैं। हमारे मन मस्तिष्क में पूर्व से कुछ विचार होते हैं और हम प्राप्त होने वाले ज्ञान को अपने उसी विचार के अनुरूप ढाल कर लेते हैं। नतीजा होता है कि जितना हमें सीखने को मिल पाता है वो सब हम सीख नहीं पाते और सीखे हुए ज्ञान को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार ही ग्रहण करते हैं। अर्जुन युद्धक्षेत्र में आते ही अवसाद का शिकार हो जाता है और युद्ध नहीं करने का निर्णय ले लेता है। यह निर्णय वह अपने पूर्वसंचित ज्ञान के अनुसार लेता है और जब उसी के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे सन्मार्ग की शिक्षा देते हैं तो उसके पुरसंचित ज्ञान ही उसका पूर्वाग्रह बन उसे श्रीकृष्ण की शिक्षा को हु ब हु प्राप्त करने से रोकते हैं। इसीलिए तृतीय अध्याय के शुरुआत में ही अर्जुन प्रश्न कर देता है कि जब श्रीकृष्ण की शिक्षा के अनुसार ही ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो फिर श्रीकृष्ण उसे युद्ध जैसे भयंकर कर्म करने के लिए भला क्यों कहा रहें हैं। स्मरण रहे कि अर्जुन पूर्व में ही युद्ध नहीं करने की ठान चुका है सो जब श्रीकृष्ण उसे शिक्षा दे रहे होते हैं तो वह सुनता तो सब है लेकिन याद रखता है अंश मात्र ही। उसे ये तो याद है कि ज्ञान श्रेष्ठ है लेकिन ये स्मरण नहीं कि इसकी प्राप्ति का मार्ग निष्काम कर्मयोग है। ऐसा नहीं कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात सुनी नहीं बल्कि ऐसा है कि उसे श्रीकृष्ण की शिक्षा में वही बात अच्छी तरह से याद रही जो उसके तर्कों का साथ दे सकती थी। उसे बल मिला कि जब श्रीकृष्ण के अनुसार ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो उसका कर्म यानी युद्ध नहीं करने का निर्णय सही साबित हो सकता है। अब देखिए मजे की बात कि द्वितीय अध्याय में श्री कृष्ण ने कँही ये नहीं कहा कि ज्ञान मार्ग श्रेष्ठ है या निष्काम कर्मयोग योग का मार्ग श्रेष्ठ है, बल्कि उन्होंने ये समझाया कि परम् सिद्धि जो परम् ज्ञान प्राप्ति की अवस्था है वो तो निष्काम कर्मयोग के  मार्ग पर चलकर ही प्राप्त हो सकता है लेकिन चुँकि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था सो वो पूरे वार्तालाप और प्राप्त शिक्षा को अपने पूर्वाग्रह  कि युद्ध नहीं करना है, कर्म नहीं करना है , के अनुसार ही लेता है।

       हम सभी हर क्षण यही करते हैं जो अर्जुन युद्ध भूमि में कर रहा है। एक ही वर्ग में पढ़ने वाले छात्र एक ही शिक्षक की एक ही बात को अपने अपने अनुसार लेते सीखते हैं। जीवन में जब भी कोई बात होती है हमारा मन अपने पसन्द(LIKE) और अपने अच्छाई के बीच में से पसन्द को सिर्फ इसलिए चुनता है क्योंकि वह उसके पूर्वाग्रह को समर्थन देता है और तार्किक बातों को जी उसका हित कर सकने में सक्षम होते हैं उनको इसलिए नहीं अपना पाता क्योंकि वह अपने पूर्वाग्रह से बाहर ही नही आना चाहता।
श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार प्राप्त करने के कारण अर्जुन की बुद्धि एक बार फिर से दिग्भ्रमित हुई है लेकिन अच्छी बात ये है कि अर्जुन अपने भ्रम को स्वीकारता है और यह स्विकारिक्ति प्रारम्भ में ही हो जाती है , अन्यथा उसका भला नहीं हो पाता। वैसे भी जागरूक विद्यार्थी वही है जो ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में होने वाले भ्रमों का तत्काल निराकरण कर लेता है या करा लेता है अन्यथा भ्रमित ज्ञान के साथ आगे बढ़ने वाले छात्र को कभी भी सही ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता। अपितु उसे घोर अज्ञान ज्ञान के नाम पर मिलता है। हम सभी को भी यही करना चाहिए जो अर्जुन कर रहा है। यदि अपने पूर्वाग्रहों के कारण या किसी अन्य कारण से हम कोई बात नहीं समझ पा रहें हों तो निश्चित ही हमें शंका का समाधान कर लेना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मोक्ष परम् लक्ष्य है, बन्धन से मुक्ति परम् लक्ष्य है, आत्मा अजर, अमर और अपरिवर्तनशील है किंतु इसे प्राप्त करने का मार्ग है निष्काम कर्म करना, जिसे करते हुए हम कर्म बन्धन से मुक्त होकर आत्म साक्षात्कार को प्राप्त होते हैं। युद्ध नहीं लड़ने के अपने पूर्वाग्रहों के कारण अर्जुन निष्काम कर्म मार्ग की यात्रा को भूलकर अंतिम लक्ष्य यानि ज्ञान प्राप्ति को याद रखता है। लेकिन उसकी चेतना अभी भी सजग है सो उसे पता है कि वह भ्रमित है। यही बात अर्जुन को सत्य के अन्वेषण में लगे अन्य छात्रों से अलग करती है। सत्य के प्रति उसकी उत्कण्ठा इतनी तीव्र है कि अपने पूर्वाग्रहों के पश्चात भी वह सत्य की प्राप्ति के लिए प्रश्न करता है कि सांख्य और कर्म में कौन श्रेष्ठ है जो उसे श्रेय देगा अर्थात अर्जुन कल्याण का आकांक्षी है। यँहा यह स्पष्ट संकेत है कि अर्जुन उस मार्ग को अपनाना चाहता है जो उसे श्रेय दें अर्थात उसका कल्याण करें न कि अर्जुन अपने पसंद के मार्ग पर टिका हुआ रहना चाहता है।

 अर्जुन के प्रश्नों से कुछ बातें हमारे जीवन में साफ हो जाती हैं--

1.हमें समझना चाहिए कि हमें जो सिखाया जाता है उसे हम तब तक हु ब हु नहीं समझ सकते जब तक हमारे अंदर हमारे पूर्वाग्रह बने हुए हैं।

2. पुराग्रह प्राप्त होने वाले ज्ञान को अपने अनुसार सरलीकृत कर देते हैं या उलझा देते हैं।

3.यदि हमें याद है कि हमारे पूर्वाग्रह बने हुए हैं और ये ज्ञान को भ्रमित कर रहें हैं तो हमें पता होता है कि ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में हमें भ्रम और शंका हो रहा है।

4. अगर इतनी जागरूकता है तो हमें तत्काल अपना शंका समाधान करना चाहिए क्योंकि भ्रमित ज्ञान अज्ञान से भी अधिक खतरनाक होता है।

5. हमें प्रिये से अधिक श्रेष्ठकर पर ध्यान चाहिए। हमें कल्याण और सत्य के मार्ग को पकड़ने के लिए इक्षुक और प्रस्तुत रहना चाहिए भले इसके लिए लिए अपने पसंद यानी LIKE का त्याग करना पड़े।
अर्जुन की शंका का समाधान करने के लिए श्रीकृष्ण उसे पुनः समझना प्रारम्भ करते हैं लेकिन इस बार श्रीकृष्ण विस्तार से समझाते हैं।

      श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्पाप कह कर सम्बोधित करते हैं अर्थात श्रीकृष्ण की नजरों में अर्जुन की शंका स्वाभाविक है न कि बनावटी। अर्जुन वह छात्र है जो अपने पूर्वाग्रहों के कारण श्रीकृष्ण की शिक्षा को प्रथम बार समझने में असमर्थ है किंतु उसे अपने पूर्वाग्रहों को ढोते रहने का मोह भी नहीं है, तभी तो वह श्रीकृष्ण से कहता है कि जो मार्ग उसके लिए श्रेय देने वाला हो उसे बताएं। इससे स्पष्ट है कि अर्जुन के मन में शिक्षा को लेकर कोई मोह नहीं है, मात्र भ्रम भर है, सो श्रीकृष्ण उसे निष्पाप कह कर पुकारते हैं। ज्ञान प्राप्ति की यही अवस्था, यही भावना हमें ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करती है।

    तत्पश्चात श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं कि जिस शिक्षा को वे उसे दे रहें हैं वह नई नहीं है बल्कि पूर्व में ही उनके द्वारा कही जा चुकी है। अर्थात यह शिक्षा पहले से ही प्रचलित है । श्रीकृष्ण के अनुसार वस्तुतः ज्ञानयोगमार्ग और निष्काम कर्मयोग एक दूसरे से विपरीत नहीं हैं बल्कि ये व्यक्ति की साधना के स्तर पर निर्भर करता है कि उसे अपनी साधना के स्तर से आगे कर्मयोग पर चलना है या ज्ञानयोग के मार्ग पर। साधना की प्रारंभिक अवस्था में कर्मयोग ही मार्ग है जिसपर चलकर साधना की उच्च अवस्था को प्राप्त कर ज्ञानयोग के मार्ग पर पर चलना होता है। प्रारम्भ में हम सभी में वे सभी दुर्बलताएँ होती हैं जो हमें कर्म फल में आसक्ति के कारण मिलती हैं। इन लिप्साओं से हठात पिंड नहीं छुड़ाया जा सकता और न ही इन लिप्साओं के साथ ज्ञान मार्ग पर चला ही जा सकता है। प्रारम्भ में हमें इन लिप्साओं से मुक्त होना होता है और यह कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ही सम्भव होता है। निरन्तर अभ्यास से कर्मफल की आसक्ति का नाश सम्भव होता है। जब व्यक्ति निरन्तर कर्मयोग के सिद्धान्त का पालन करते हुए कर्म में प्रवृत्त होता है तो शनैः शनैः उसके साधना की अवस्था उन्नत होती है और उच्चतर स्तर पर पहुँच कर ही वह कर्मबन्धन से मुक्त होकर ज्ञान के मार्ग पर चल पाता है। बिना कर्मयोग के जो ज्ञानमार्ग पर चलने की कोशिश करता है उसका क्षय होना तय है क्योंकि कर्मयोग के अभाव में कर्म से और उसके परिणाम की आसक्ति से जुड़ी हर बीमारी उसके साथ ही होती है। तब न उसे शांति रहती है न वह मोह से और मोह जनित दुर्गुणों से मुक्त ही रहता है। सो ऐसा नहीं है कि एक के बिना दूसरा प्राप्त हो जाये। सांख्ययोग यानी स्व की प्राप्ति अंतिम लक्ष्य है लेकिन वहाँ तक पहुंचने का मार्ग निष्काम कर्मयोग है। हम आप कँहा से शुरू करें यह हमारी तात्कालिक अवस्था पर निर्भर है जो हमारे गुणों के अनुपात से तय होती है। श्रीकृष्ण का मत है कि अर्जुन की अवस्था अभी कर्मयोग में प्रवृत्त होने की है, अभी उसके मन में काम, क्रोध, ईर्ष्या, लालसा आदि बचे हुए हैं जिनसे मुक्त होना जरूरी है क्योंकि इनको छोड़े बिना ज्ञान की प्राप्ति , आत्मसाक्षत्कार की प्राप्ति सम्भव नहीं है। हम सभी पाठक, हम सभी प्रत्याशी भी तो इसी अवस्था में हैं, कामनाओं के वश में सो हम सभी को अभी निष्काम कर्मयोग के मार्ग का अभ्यास करना है ताकि हम परम् ज्ञान की अवस्था को प्राप्त करने के योग्य हो सकें।
बिना कर्मयोग के ज्ञान क्यों नहीं प्राप्त हो सकता है इसे समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि बलात कर्म प्रारम्भ नहीं करने अथवा बलात कर्म का त्याग कर देने मात्र से कोई नैष्कर्म्य की स्थिति को प्राप्त नहीं हो सकता। नैष्कर्म्य ही वह अवस्था है जब कर्म का बन्धन छूट जाता है। कर्म तो हर हालत में होता है चाहे हम आप जिस अवस्था में हों, योग की जिस सीढ़ी पर हों लेकिन जब कर्म करते वक्त खुद के कर्ता होने का भान नहीं होता तब कर्म कोई फल भी उस व्यक्ति के लिए नहीं दे पाते अर्थात अकर्म की श्रेणी में हो जाते हैं। लेकिन नैष्कर्म्य व्यक्ति भी कर्म करते  तो रहता है, हाँ उसके कर्म उसके शरीर से होते हैं , उनमें उसकी कोई भूमिका नहीं होती है क्योंकि इनके फलों से उसका सेल्फ मुक्त होता है और उस व्यक्ति के अंदर कर्तापन का बोध खत्म हो चुका होता है। बलात कर्म नहीं करने से अथवा किये जा रहे कर्म को त्याग देने मात्र से ये बोध नहीं आता। स्मरण करें कि द्वितीय अध्याय में भी श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया समझाया है कि बलात कर्म रोकने से कामनाओं की कितनी तीव्र वासना समय पाकर बलवती हो उठती हैं।
कर्म करने की अनिवार्यता पर  जोर देते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि बिना कर्म किये कोई भी एक क्षण नहीं रह सकता, सो कर्म का त्याग करने का विचार ही निरर्थक है। हम कर्म क्यों करते हैं। यह प्रकृति है जो हमें निरन्तर कर्म करने के लिए बाध्य करती है और कोई भी इस बाध्यता से बाहर नहीं है। हम सोए हों या कोई कोमा में ही क्यों न हो उसका शरीर कर्म करते रहता है। यदि शरीर निश्चेष्ट हो तो भी उसके अंदर कर्म होते रहते हैं, मन के स्तर पर भी निरन्तर कर्म होते ही रहते हैं। यदि कोई  दावा करता है कि वह तो सब कर्म त्याग कर मात्र ध्यान कर रहा है तो उसे गौर से परखें, कि क्या वास्तव में उसने अपने सभी शारीरिक और मानसिक कर्मों का त्याग कर दिया है। आप पाते हैं कि ऐसा नहीं है और समस्त कर्मों का त्याग का दावा धोखा मात्र है। यह कर्म प्रकृति के अधीन हमेशा ही क्रियाशील हैं। 

    प्रकृति से उत्पन्न गुणों को श्रीकृष्ण तीन भागों में बांटते हैं, जिन्हें हम आगे देखेंगे। अभी के लिए इतना ही कि ये तीन गुण हैं तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण जिनको हम तत्काल ये समझ सकते हैं कि

1.तमोगुण जड़ता(INERTIA) का प्रतीक है,

2. रजोगुण गति(ACTIVITY) का प्रतीक है

और 3. सत्वगुण बुद्धि( INTELLECT) का प्रतीक है।

   इन्हीं तीन गुणों के द्वारा मनुष्य बराबर क्रियाशील रहता है ओर क्रियाशीलता ही विकास का कारण बनती है। यदि हम कर्म न करें तो हमारी अवस्था न बदले और हम उत्थान न कर पाएं। कर्मों के अभाव में हम शारीरिक और मानसिक रूप से जैसे थे वैसे ही बने रह जाएँ सो कर्म तो अनिवार्यतः होने ही हैं, बलात रोकने का प्रयास समय, ऊर्जा , लक्ष्य तीनों का अपव्यय ही है। ये कर्म ही हैं जो हमें  हम जँहा हैं वँहा से सन्मार्ग पर ले जाते हैं। जब कर्मों का त्याग बलात नहीं होता बल्कि आत्मसाक्षत्कार के उपरांत कर्म कर्म में बरतने लगते हैं यानी बिना हमें प्रभावित किये अपनी स्वभाविक क्रिया में संचालित होते हैं तब हम नैष्कर्म्य की स्थिति को पाते हैं। लेकिन कर्म तब भी रहते हैं , अकर्म के स्वरूप में। 
श्रीकृष्ण कर्म करने की महत्ता आगे बढ़ाते हुए कुछ ज्यादा मुखर होकर कहते हैं कि बिना ज्ञान के कर्मेन्द्रियों को बलात रोककर मन ही मन उन इन्द्रीयो के विषयों के चिंतन में लगे रहना ढोंग है। हम इन्द्रीयों द्वारा संचालित शारीरिक चेष्टाओं को तो बल पूर्वक रोक सकते हैं लेकिन इन्द्रीयिओं के विषय से सम्बंधित  मन मस्तिष्क में चल रहे विचारों को नहीं रोक सकते बलपूर्वक। इस प्रकार ऊपर से शांत दिखने वाला व्यक्ति मन ही मन बहुत ही उद्वेलित हुआ रहता है, उसका ध्यान हमेशा बाहरी चीजों पर ही टिका हुआ रहता है। इस प्रकार का आचरण ढोंग ही है। हम सभी जब भी पूजा पाठ ध्यान आदि में लगते हैं बार बार अपने इष्ट और अनिष्ट् के बारे में सोचते रहते हैं। हम ध्यान नहीं करते बल्कि ध्यान का ढोंग करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ने यँहा इशारा कर दिया है कि बिना कर्म के ध्यान की अवस्था पाने की ख्वाहिश महज मिथ्या आचरण है, और कुछ नहीं। इस जगह पर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मयोग के बिना कोई भी ध्यान सम्भव ही नहीं है।
अब तक श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्म के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है। पहला कदम कर्म का उठता है,तब दूसरा कदम ज्ञान का है। कर्म नीव है, ज्ञान उसका अंतिम छोर है। बिना नीव के छत भला कैसे तैयार होगा। कर्म हमेशा हैं लेकिन कर्म करना कैसे है कि ज्ञान प्राप्त हो सके? क्या किसी भी तरह से कर्म करने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नहीं। कर्म करने का नियत तरीका है, और वह तरीका है कर्मयोग का है। बलात इंद्रोयों को दाब कर, बलात अपने सेंसेज को शांत कर यदि कोई कर्म करता है तो वह कर्मयोग का आचरण नहीं है। द्वितीय अध्याय को यदि हम फिर से देखें तो हमें स्मरण होगा कि कर्म करने में यदि हम जबरन इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं तो ऊपर से शांत दिखने वाली हमारी इन्द्रियों के विषय समाप्त नहीं होते, बल्कि वे सुप्त रहते हैं जो अनुकूल अवसर पाते ही हमारे कर्मों को अपने विषयों में खींच लेते हैं। अतएव कर्मयोग में कर्म करने में जबरन अपने सेसेस को नियंत्रित करने का कदापि प्रयास न करें।

            इन्द्रियों के द्वारा हमारी इक्षाएँ, हमारी कामनाएं अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं । जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित होती हैं तो उनकी अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जाती हैं और हम अपनी पसंद से कर्म करने लगते हैं जो जरूरी नहीं कि सही भी हों। नतीजा ये निकलता है कि सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है। यदि सड़क पर सभी अपनी ही इक्षा से गाड़ी चलाने लग जाएं तो सड़क पर भीषण जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका निदान क्या है? क्या सभी को चलने से रोक दिया जाए? यह तो कोई निदान नहीं हुआ। तो इसका निदान है कि लोगों के चलने के नियम बना दिये जायें और उनका पालन किया जाए। कर्मों के करने में सिर्फ इन्द्रियों पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता है, बुद्धि से उनपर नियंत्रण जरूरी है ताकि हम इन्द्रियों को वश में रखकर सही मार्ग से चलें न कि पसंदीदा मार्ग के लोभ से चलें। अब ये कैसे हो सकता है? इसका सरलतम उपाय है कि हम अपनी बुद्धि को उत्तोरोत्तर ऊँचा लक्ष्य दें। एक छात्र है। उसका काम अच्छी तरह से पढ़ाई करना है। यदि वह इस तथ्य से अवगत है कि समय का सदुपयोग कर, यदि वह संयमित होकर  पढ़ाई करेगा तो उसे किसी बाहरी व्यक्ति के डर से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वो खुद ब खुद मेहनत करेगा। लेकिन यदि उस छात्र की बुद्धि में उच्च लक्ष्य नहीं हैं, उसके अभिभावक चाहते हैं लेकिन वो नहीं चाहता तो अभिभावक के दबाव और डर से वह पढ़ने तो बैठता है लेकिन उसकी आँखें पुस्तक पर रहते हुए भी मस्तिष्क कँही और होता है, अपने प्रिय काम में लगा होता है। नतीजा होता है कि पढ़ने का उपक्रम कर के भी नही पढ़ पाता। उसके कर्म उसके सही के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उसके पसन्द से नियंत्रित होते हैं। वह उन्द्रियों के प्रभाव में इधर उधर भटकता रह जाता है।

   इस प्रकार श्रीकृष्ण इस मत का साफ साफ खंडन करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें या तो कर्म करने ही नहीं चाहिए या फिर इन्द्रियों को जबरन दाबकर कर्म करना चाहिए। उनका मत है कि कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करें, जिसमें कर्मफल से कोई आसक्ति नहीं होती। इस अवस्था में कामनाओं के वश में किये जाने वाले कर्मों से भी वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं, मन धीरे धीरे शांत हो चलता है और हम शनैः शनैः ज्ञान के मार्ग पर बढ़ जाते हैं। कर्मयोग से किये कर्म से ही ज्ञान मिलता है, कर्म के छोड़ने से नहीं।
कर्म का महत्व बताते हुए श्रीकृष्ण इस बात पर जोर देते हैं कि कर्म नहीं करने से कर्म करना ही उचित है। अर्थात जो कर्मों से भागते हैं वे गलत हैं। यँहा श्रीकृष्ण दो बातें बताते हैं

1.पहला कि हमें शास्त्रों में निश्चित किये हुए कर्मों को करना चाहिए

2.दूसरा कि कर्म करने से ही शरीर निर्वाह भी सिद्ध होता है।

    इस प्रकार श्रीकृष्ण स्पष्ट कर देते हैं कि इस शरीर का प्रयोजन कर्म करने से ही पूरा होता है। साथ ही उन्होंने नियत कर्म करने का निदेश भी दिया है अर्थात वे कर्म जिनको करना हमारी प्रतिबद्धता है, यदि हम उनको नहीं करते हैं तो हम कुछ गलत कर रहें होते हैं।  ये नियत कर्म हैं क्या? श्रीकृष्ण यँहा , इस जगह पर तो इसकी व्याख्या नहीं करते , आगे स्पष्ट करते हैं लेकिन अब तक श्रीकृष्ण ने जो शिक्षा दी है उससे हम समझ सकते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के कुछ तो स्थाई कर्म हैं जो उसे करने हैं जो उसके स्वयम के शरीर, मन-मस्तिष्क, बुद्धि, परिवार, समाज, देश और संसार के प्रति करने ही हैं। इनकी विस्तृत व्याख्या आगे मिलेगी। अभी के लिए इतना ही कि हमें स्वम के शरीर को साफ सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए, मन बुद्धि को सुविचारों से परिपूर्ण रखना चाहिए, बुद्धि के स्तर पर हमें उच्च ज्ञान के प्रति समर्पित रखना चाहिए, अपने परिवार और समाज को जिनसे हम बहुत कुछ प्राप्त करते हैं उनके लिए समर्पित होकर रहना चाहिए, अपने राष्ट्र, संसार, इसकी भौतिक और प्राकृतिक सम्पदा की , इसके पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। ये सब  बातें अभी तो श्रीकृष्ण बहुत स्पष्ट रूप से नहीं कह रहे हैं लेकिन अभी तक उन्होंने अर्जुन को जो भी शिक्षा दी है उससे हम यही समझ पा रहें हैं। आगे इस नियत कर्म की विस्तृत व्याख्या हम सब देखेंगे।
अर्जुन को समझते हए श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि बिना कर्म किये  कल्याण नहीं हो सकता, फिर बता चुके हैं कि हमें नियत कर्म करने होते हैं। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि नियत कर्म क्या है जिसको नहीं कर अन्य कर्म करने से कर्मों के बंधन में हम उलझ जाते हैं।

      जब कर्मों को करने के पीछे कामनाएँ होती हैं और कर्मफल के साथ आसक्ति होती है तो हम जो कर्म करते हैं उनसे बन्धें होते हैं क्योंकि तब हम कर्म के परिणामों के अनुसार ही आगे का आचरण करते हैं। कामनाओं के आधार पर किये गए कर्मों के कारण  निम्न में से कोई परिणाम प्राप्त होते हैं

1.मोह

हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।

2.लोभ

यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।

3.क्रोध

यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।

4.ईष्या

 इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।

यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।

5.

घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर  घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।

     वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी  हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।

          इस प्रकार कामनाओं के वश में होकर किये गए कर्म कर्मबन्धन में बाँधते हैं।  इसके विपरीत यदि हम परिणाम से असंगत होकर कर्म करते हैं तो कर्मबन्धन में नहीं पड़ते।  यँहा श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यज्ञकर्म करें। यह यज्ञकर्म क्या है जिसे करने से हम कर्मबन्धन में नहीं पड़ते। वस्तुतः कर्मयोग के बुद्धि के अनुसार जब हम कर्म करते हैं तो वही यज्ञ है जिसे द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया है। इस बुद्धि के अनुसार कर्म करने का दृष्टिकोण निम्नवत है जिसे हमने द्वितीय अध्याय में भी देखा है, लेकिन समग्र समझ के लिए इसे पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है

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अगर हमें कुछ प्राप्त करना होता है तो उसके निम्न चार  चरण हैं

1.उद्देश्य का निर्धारण और उसकी समझ

2.उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग की जानकारी

3.उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग पर चलना

4.मार्ग पर अंत तक चलकर उस उद्देश्य को प्राप्त करना।

ये चारों चरण क्रमिक हैं, किसी को लाँघ कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।

अर्जुन युद्धभूमि में युद्ध करने की तैयारी के साथ पहुँच कर दिग्भ्रमित और विषादयुक हो जाता है। उसे उद्देश्य का ज्ञान नहीं रहता है सो भटक जाता है। ऐसे में उसके अनुरोध पर श्रीकृष्ण उसकी रक्षा में आगे आते हैं, उसके भ्रम को समाप्त करने हेतु। अर्जुन की नजर में उसका उद्देश्य युद्ध है सो युद्ध की सम्भावित विभीषिका और परिणाम से वह व्यथित हो जाता है। तब श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं , ज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान उक्त चार चरणों में है। क्रमिक है।

    सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके उद्देश्य से परिचित कराते हैं। उद्देश्य वही है जो सबका है, अर्थात आत्मसाक्षात्कार करना यानी अपनी आत्मा का बोध करना यानी सेल्फ को खोजना और उसे प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाना। युद्ध तो मात्र इस मार्ग के क्रम में घटित होने वाली घटना है जिसका निर्वहन अनिवार्य है ताकि क्रमिक रूप से आगे बढ़ा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नित्य नए नए अवसर आते रहते हैं जिनका उसे निर्वहन करना होता है, उनको छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। आपको पढ़ना है, परीक्षा उत्तीर्ण करनी है, कमाना है, आदि आदि। लेकिन ये सब आपके उद्देश्य नहीं हैं। आपका हमारा उद्देश्य है अपने स्व को पाना और उसे पाकर परमात्मा से मिल जाना। सर्वप्रथम इसी उद्देश्य को श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक परिभाषित करते हैं। यही साँख्य योग है। योग यानी खुद से जुड़ना। जब हम जन्म लेते हैं और धीरे धीरे बड़े होते हैं तो उस समय हमें अपने शरीर और बौद्धिकता का तो ज्ञान होता है लेकिन हम अपनी आत्मा से ,अपने स्व/सेल्फ से अनजान बने रहते हैं। जब हमें इसका भान होता है , जब हमें लगता है कि हमें ये पता नहीं कि हम वास्तव में कौन हैं तब हम अपने सेल्फ की खोज का उद्देश्य पाते हैं। आत्मसाक्षात्कार की यह पहली सीढ़ी है जिसपर हमें चढ़ना होता है। जीवन का लक्ष्य बड़ा पद, पैसा आदि ही होते तो हम उन्हें पाकर हमेशा सन्तुष्ट , प्रसन्न और सुखी होते। लेकिन ऐसा नहीं होता है अर्थात ये सब जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, बीच की अवस्थाएँ हैं। अंतिम लक्ष्य तो स्व की प्राप्ति और उस प्राप्ति के साथ परमात्मा से मिलन है। अर्थात सत् की प्राप्ति हमारा उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के साथ जीवन के प्रति  हमारा भय समाप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण की यही शिक्षा सांख्ययोग है।

   द्वितीय चरण में श्रीकृष्ण उस मार्ग का ज्ञान देते हैं जिससे इस सत् की प्राप्ति होती है। ये मार्ग योग और कर्म का है। इसे श्रीकृष्ण कर्मयोग कहते है । लेकिन उसके पूर्व द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए। 

     तब हम तृतीय चरण में प्रवेश करते हैं यानी अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं जो कर्मयोग के मार्ग से चलती है।

  अंत में हम अपने उद्देश्य को प्राप्त करते हैं । उद्देश्य की प्राप्ति के साथ ही मार्ग से मुक्त हो जाते हैं। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!

कर्मयोग का प्रारंभिक परिचय देने के पश्चात श्रीकृष्ण कर्मयोग के महत्व और विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। हम आप देखते हैं कि जब हम सामान्य सांसारिक कार्यों को सामान्य सांसारिक दृष्टिकोण से करते हैं तो दो बातें होती हैं

1.ये कोई भी कार्य स्थाई नही  होता है। 

2.चूँकि कार्य करने का हमारा दृष्टिकोण भी सामान्य सांसारिक होता है हम कार्य के परिणाम से प्रभावित होते रहते हैं, जो निम्न प्रकार के हो सकते हैं

1. हो सकता है कि हम अपने कार्य में सफल हो तब हमें  प्रसन्नता होती है, हम सुख का अनुभव करते हैं।

2.हो सकता है कि हम असफल हो, तब दुखी होते हैं, विरह और विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं

3.हो सकता है कि हमें जो परिणाम मिले वो अपेक्षित ही न हो, सोचते कुछ हों और हो कुछ जाए जो हमारे मनोकुल भी हो सकता है या नहीं भी और उसी के अनुसार हम खुशी या दुख का भी अनुभव करते हैं

     इस प्रकार हम बराबर अपने कार्यों के परिणाम से प्रभावित होते रहते  हैं और उन परिणामों के अनुसार ही दुख सुख पाते रहते हैं। इस प्रकार हममें स्थायित्व नहीं रहता और दिन भर में कई बार हमारे मनोभाव बदलते रहते हैं। इतने अस्थिर चित्त से हम सत्य की खोज नहीं कर सकते और नहीं कर पाते। परिणाम के प्रति हमारा लगाव के कारण हम परिणाम के प्रभाव से हमेशा डरे रहते हैं। सफलता असफलता, लाभ हानि, जय पराजय के डर से हमारा जीवन इतना हलचल भरा होता है कि हमें हमेशा अपने तात्कालिक स्थान से गिरने का भय लगा रहता है। अब आप खुद के जीवन को देखें। हम आप बराबर इसी डर में रहते हैं और नतीजा में एकदम बेचैन हुए रहते हैं।

    अब समझने की कोशिश करें कि श्रीकृष्ण इस विषय में क्या कह रहे हैं। जब हम कर्तव्य के परिणाम के प्रति समत्व भाव यानी सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम भाव से रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से परिणाम के प्रति हम निरपेक्ष होते हैं। इसे दूसरी तरह से देखें तो पाते हैं यदि हम अपने कर्मों के परिणाम से अप्रभावित/निरपेक्ष होते हैं तो फिर हमपर इस बात का कोई असर नही। पड़ता कि हमारे कर्तव्य पालन का क्या परिणाम निकलता है। 

यँहा एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। परिणाम के प्रति समत्व का भाव यदि समझ में नहीं आता तो इस शिक्षा से आपको नकरारात्मता भी आ सकती है, हम निश्चिंत हो सकते है कि हमारा काम तो कर देना है बाकी भगवान जाने कि क्या फल देंगे। समत्व भाव का अर्थ ये कदापि नहीं है कि परिणाम के लिए हम ईश्वर पर निर्भर करें। श्रीमद्भागवत गीता में ही श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि भगवान न कुछ करते है न कुछ कराते हैं।  बल्कि ये हमारा प्रयास है और प्रयास के पीछे हमारी श्रद्धा है जो निर्धारित करती है कि परिणाम कैसा होगा।

समत्व भाव की शिक्षा का तात्पर्य ये है कि हमें सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में परिणाम के प्रभाव में बह नही जाना चाहिए । अगर हम इन प्रभावों से स्वयं को मुक्त रखते हैं तो असफलता की स्थिति में भी हतोत्साहित नहीं होते बल्कि इस बात पर ध्यान देते हैं कि कर्तव्य पालन में हम पूरी सावधानी बरतें ताकि कोई चूक न हो जाये। ऐसी स्थिति में हम पूरे सावधानी से कर्तव्य पालन करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इसमें बीज का नाश नही होता अर्थात  एक बार धुनि लग गई तो मन की भावनाएँ, इन्द्रियों के प्रयास संयमित हो जाते हैं , हम अस्थिर होकर भटकते नहीं बल्कि अपने लक्ष्य जो स्व की प्राप्ति है और जो कर्म करने से ही पाप्त होता है उसी में शांत चित्त लगे रहते हैं।

  सनद रहे कि श्रीकृष्ण ने कर्म को अभी तक परिभाषित नहीं किया है। कर्म को आगे के अध्याय में स्पष्ट करेंगे। अभी तो मात्र निष्काम कर्म करने में बरतने जाने वाली सावधानियों और कर्म की विशेषता पर ही वे चर्चा कर रहें हैं।

कर्मयोग की विशेषताओं को  बताते हुए श्रीकृष्ण आगे मनुष्य जीवन के लक्ष्य प्राप्ति के सम्बंध में समझाते हैं। हमारे जीवन के लक्ष्य क्या होने चाहिए , इसका निर्णय कैसे होता है। इसका निर्णय मनुष्य की बुद्धि से होता है। किंतु मनुष्य की बुद्धि हो तो कैसी हो जो उसके लक्ष्यों को निर्धारित  करें।

बुद्धि दो तरह की हो सकती है

1.एक ऐसी बुद्धि जो  एक लक्ष्य को सामने रखे, उसमें कोई विवाद न हो। जिसे साँख्य का ज्ञान है उसका लक्ष्य तो निर्धारित है। उसका लक्ष्य उसकी बुद्धि के अनुसार अपने आत्मबोध का परिचय प्राप्त करना होता है। 

2.दूसरी तरफ बुद्धि अस्थिर भी हो सकती है जिसमें लक्ष्यों की भरमार तो हो लेकिन जो आत्मपरिचय के लक्ष्य से दूर हो। यह बुद्धि उन्ही चीजों को लक्ष्य बनाती है जिसे हमारी इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं और चूँकि इन्द्रियों का अनुभव भिन्न भिन्न प्रकार का होता है लक्ष्य भी भिन्न भिन्न तरह के हो जाते हैं । नतीजा ये निकलता है कि इस तरह का मनुष्य बार बार भ्रमित होते रहता है, एक छोर से दूसरे छोर तक जीवन भर भागते रह जाता है। 

        अगर हमें स्थिर बुद्धि आत्मबोध के लक्ष्य के साथ चाहिए तो दृढ़ता से उस ज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। इस तरह के ज्ञान प्राप्ति के लिए निम्न तरीके हैं---

1प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा, जो हमें इन्द्रियों के अनुभव से प्राप्त होते हैं,

2.किसी एक जानकारी से दूसरी जानकारी का निष्कर्ष निकाल कर,

3. अज्ञात की  तुलना ज्ञात से कर के,

4. परिणाम और उसके कारक को समझ कर

5. प्रमाणिक पुस्तक/शास्त्र एवम उसके शिक्षक से, तथा

6.किसी की अनुपस्थिति को जानकर।

     मनुष्य की बौद्धिकता प्रतिरोधात्मक होती है यानी वह नए ज्ञान को सहजता से नहीं स्वीकारती। इसी कारण जब लक्ष्यों की पोषक बुद्धि को एक निश्चयात्मक होने का निर्देश दिया जाता है तो वह प्रतिरोध के रूप में विवाद करती है, इन्द्रिय जनित सुख देने वाले लक्ष्यों से हटना नहीं चाहती।वह चाहता तो है सुख, शांति, अमरत्व, स्वतंत्रता लेकिन इसके लिए साधनों का उपयोग करना चाहता है उससे उसे ये सब मिल नहीं सकते।  इन साध्यों को प्राप्त करने के लिए हमारी बुद्धि का उधेश्य उस ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए जिसे पाकर हम परम् सत्य यानी आत्मबोध को प्राप्त कर सकें। 

आदमी का क्या लक्ष्य होना चहिये ये समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझते हैं कि जब इंसान के जीवन में परम् लक्ष्य न होकर कई भोग विलास से सम्बंधित लक्ष्यों को पालता है तो उसका क्या व्यवहार होता है। जब हमारी नजर सिर्फ सुख, सुविधा , धन संपत्ति, पर होती है तो फिर ऐसी स्थिति में हम सिर्फ इसी उपाय में लगे रहते हैं कि किस प्रकार हमारे भौतिक सुखों में हमेशा बढ़ोत्तरी होती रहे।

    इस प्रकार के लक्ष्यों को रखने वाले लोग भी दो तरह के होते हैं।

एक वैसे लोग होते हैं जो हमेशा हर कीमत पर सिर्फ अपने भौतिक उपलब्धियों को पूरा करने में लगे रहते हैं। इस हेतु यदि उनको लगता है कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ गलत भी करना हो तो ये लोग नहीं हिचकते हैं। ऐसे मनुष्य इस बात में यकीन करते हैं कि यदि कोई वस्तु या सामग्री या कोई भी चीज यदि उनके सामर्थ्य में है तो हर हालत में वो उनको मिलनी चाहिए चाहे इसके लिए अनैतिक कार्य करना हो तो वो भी कर लेंगे।

       दूसरे उस तरह के लोग होते हैं जो अनैतिक कामों से तो बचना चाहते हैं लेकिन उनकी नजर भी उन्हीं सुख सुविधाओं पर टिकी रहती है और इसके लिए वे शास्त्रों में वर्णित तरह तरह के कर्मकांड में लिप्त रहते हैं। ये लोग स्वर्ग की कल्पना और उसकी इक्षा में लगे रहते हैं। ऐसे लोग जीवन की सुविधाओं को बढ़ाने में लगे रहते हैं। सुख, सुविधा, भौतिक ऐशो आराम, बाल बच्चों का उज्ज्वल भविष्य बस यही सब उनका लक्ष्य होते हैं। सुविधाओं में बढ़ोत्तरी ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

       हमारा प्राथमिक उद्देश्य सिर्फ भौतिक सुख सुविधाओं में बढ़ोत्तरी, धन संपत्ति में बढ़ोत्तरी, बच्चों के भविष्य, उच्च पद प्रतिष्ठा जैसी चीजें ही होती हैं तो फिर इनको सही ठहराने के लिए आलंकारिक भाषा में कई तर्क भी देते रहते हैं जिनमें वे आध्यात्मिकता का पुट भी डालते रहते हैं ताकि उनके तर्क आकर्षक बन सके।

    जब हमारे पास इतने काम हों, जब हमारे पास इतने लक्ष्य हों तो फिर स्थिर मन से भला कब हम आत्मसाक्षात्कार का प्रयास कर पाएंगे। सुख सुविधा को पूरा करने के चक्कर में चंचल मन भला कब समय निकाल पाए कि उसे आत्मशोध करने का समय मिले।

        जब हम सिर्फ भौतिक सुख सुविधा के भँवर में फँसे होते है तब हम क्या करते हैं जरा इसका अवलोकन करें।  सुबह से शाम तक हम इसी प्रयास में लगे होते हैं कि हम कौन उपाय करें कि हमारी संपत्ति बढ़ जाये, कैसे हमारा ऐश्वर्य और सुख सुविधा बढ़ जाये , कैसे हमारा पद बढ़ जाये, आदि। इस स्थिति में हम अनैतिक साधन अपनाने से भी परहेज नहीं करते। या फिर कुछ लोग परलोक की चिंता में पूण्य बटोरने के चक्कर में , अपने जीवन में सुख सुविधा बढाने के लिए तरह तरह के कर्म कांड भी करते हैं। 

        अंतिम लक्ष्य तो सुख की प्राप्ति ही होता है लेकिन ये सुख भौतिक और शारीरिक होता है और इसको पूरा करने का मार्ग ऐसा होता है जिसमें हमें फुर्सत ही नहीं मिलता। एक सुख मिला नहीं कि दूसरे के फेरा में पर गए! पूरा जीवन इसी में बीत गया। ऐसे इंसान के जीवन में सुख मृगमरीचिका है।

      इसी प्रकार सुख की इक्षा पूर्ति के लिए तरह तरह के कर्मकांडी भी सुख तो कभी नहीं पाते लेकिन सुख की चाह में हमेशा दर दर भटकते दुखी ही रह जाते हैं। कभी  अपने लिए, कभी पत्नी के लिए , कभी सन्तान के लिए, कभी पूण्य बटोरने के लिए, कभी पापकर्म के प्रभाव को काटने के लिए। अंतहीन सिलसिला है। तब सुख कँहा है? 

सुख तो उसी दृढ़ बुद्धि में है जो ये सिखाती है कि हम अपने अंदर सुख खोजे, इस हेतु निर्धारित तरीके से जिये यानी निष्काम भाव से।

        एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या जीवन को बेहतर बनाने के जो भौतिक प्रयास किये जाते हैं वे अर्थहीन हैं? कदापि नहीं। निष्काम कर्मयोग की शिक्षा कदापि कर्महीनता नहीं है। कर्म तो करना ही है। कर्म कर के ही हम उस सुखद स्थिति को पाते हैं जिसमें सुख के उपरांत दुख नहीं है। लेकिन कर्मयोग कर्म करने की विधि को बताता है जिसे  श्लोक 39-40 में हम देखे हैं और जिसके बारे में आगे विस्तार से श्रीकृष्ण व्यक्त भी करेंगे। अभी के लिए इतना ही कि निष्काम कर्मयोग का तातपर्य कर्महीनता नहीं है बल्कि कर्म करने की वो विधि है जिसमें कर्म के परिणाम के प्रति आसक्ति और मोह नहीं होता है। ये कैसे सम्भव है आगे देखेंगे।

   श्रीकृष्ण ऊपर समझायें हैं कि भौतिक भोगो की अभिलाषा में रत मनुष्य भौतिक सुख सविधाओं की प्राप्ति का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए शास्त्रों (वेद) का तर्क देते हैं। सभी व्यक्ति जो ये प्रयास करते हैं कि भौतिकता में उनकी अनुरक्तता को आध्यात्मिक मान्यता मिल जाये वे यह दिखाने की कोशिश करते रहते हैं कि उनके आचरण को अध्यात्म अथवा धर्म का समर्थन हासिल है , सो वे अपने पक्ष में वेदों यानी धर्म शास्त्रों का उदाहरण देते हैं। हम देखते हैं कि समाज की हर रीति कुरीति को सही ठहराने के लिए उसके समर्थक धार्मिकता का आवरण चढ़ाने से बाज नहीं आते और तरह तरह की क्रियाओं से अपने आचरण को आडम्बरयुक्त कर उसे महिमामंडित करने की कोशिश करते रहते हैं। प्रतिदिन हमारे समक्ष ऐसे अगिनत उदाहरण आते रहते हैं। तकनीक के इस युग में संचार के अतिसुलभ साधन उपलब्ध हैं,यथा टेलीविजन और इंटरनेट आधारित उपकरण। सोशल मीडिया के माध्यम से एक जगह बैठा एक व्यक्ति एक ही समय में अत्यंत तीव्र गति से असंख्य लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसका परिणाम होता है कि हर भौतिक भोग विलास के पक्ष में एक धार्मिक उद्धरण सहजता से प्रचलित कर देते हैं जबकि उनका वास्तविक  प्रसंग कुछ अन्य ही होता है।

   श्रीकृष्ण बताते हैं कि शास्त्र के वे पक्ष जो भौतिक भोगों की पूर्ति से जुड़े हैं वे मनुष्य के तीनों गुणों यथा सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न आवश्यकताओं की ही पूर्ति करते हैं। ये जरूरी भले सकते हों अनिवार्य और अंतिम सत्य तो नहीं हैं क्योंकि जब तक हम इन गुणों में उलझे रहते हैं हमारे सामने नित्य नई नई आवश्यकताएँ और क्रियाएँ और भावनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं जिनकी पूर्ति में लगा मनुष्य  सारा समय उसी पूर्ति के प्रयास में गँवा देता है। इस स्थिति में आपको फुर्सत कँहा कि हम आप आत्मसाक्षात्कार का प्रयास भी कर पाएं। सो हम अपने सेल्फ से, अपनी आत्मा से दूर चले जाते हैं। हमारा सारा समय जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की कोशिश यानी योग और जो है उसको बचाने में यानी क्षेम में निकल जाता है।

   इसी स्थिति को ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से सभी मनुष्यों को ये संदेश दिया है कि हम इंसान अपने गुणों के प्रभाव से बाहर निकलें, गुणों से परे हों। अगर हम थोड़ा सा ध्यान दें तो तो पाते हैं कि पशु पक्षी आदि जो भी करते हैं वे सभी उनके गुणों के अनुसार ही होते हैं। प्रशिक्षण देने पर कुछेक पशुओं  के व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन तो होता है लेकिन वो भी स्थाई नहीं है। मनुष्य ही एकमात्र जीव है जिसमें अपने गुणों को काटने की क्षमता होती है। जो जितना त्रिगुणों से परे होता है वो उतना ही निश्चिंत और शांत होता है। तब वह व्यक्ति सारी आवश्यकताओं के रहते और उनकी पूर्ति करते भी उन आवश्यकताओं से बंधता नही है।

वे आवश्यकताएँ उसके लिए मोह का कारण नहीं बंध पाते। सो इस तरह का मनुष्य सत्य के प्रति विशेष आग्रह रखता है, उसका सत्य होता है  उसका अपना सेल्फ/अपनी आत्मा। इन्द्रियों और इन्द्रीयजनित बुद्धि से आगे जाकर वह व्यक्ति सत को खोजता है। उसे न तो किसी वस्तु विशेष को पाने की बेचैनी होती है , न ही जो सुख सुविधा  है खोने का डर होता है। वह इन बेचैनियों से मुक्त आत्म में निष्ठ होता है।

    इस प्रकार श्रीकृष्ण मनुष्य को जब तीनों गुणों से बाहर निकलने की बात कहते हैं तो उसके लिए चार तरीकों को बताया भी है

1.न तो किसी वस्तु को जो उसके पास नहीं है को पाने का प्रयास, न ही जो है उसे सुरक्षित रखने का प्रयास।

2.इस प्रकार का निर्विकार मनुष्य लाभ- हानि, जय-पराजय, हर्ष-विषाद के विरोधाभासी द्वंद्व से मुक्ति।

3.उक्त विशेषता से युक्त मनुष्य के अंदर के तमोंगुण ,रजोगुण और सत्वगुण नष्ट हो जाते हैं और मात्र सत्य का आग्रह होता है। मन और बुद्धि से परे व्यक्ति अहंकार, मोह आदि से अलग हो चुका होता है,शुद्ध रूप में आतंदर्शन की तरफ अग्रसर होता है।

4.इस स्थिति में व्यक्ति आत्मावान यानी आत्मिक अवस्था में ही होता है।

     इस तरह हम देखते हैं कि कर्मयोग के रास्ते चलता व्यक्ति किस तरह से कर्म करते  आत्मसाक्षात्कार के तरफ अग्रसर होता है। उपरोक्त चारों को यदि हम उल्टे क्रम से देखेंगे तो पाएंगे कि आत्मनिष्ठ व्यक्ति की प्रकृति किस तरह की होती है जिसे श्रीकृष्ण आगे इस अध्याय के अंत में थोड़ा विस्तार से बताएंगे। उपरोक्त क्रमों के अभ्यास से हम भी, आप भी, सभी  भ्रम और मोह और उनसे जनित व्याधियों से मुक्त हो सकते हैं। ये अवस्था अभ्यास से मिलती है। यदि दैनिक जीवन के प्रत्येक प्रसंग में हम इनका अभ्यास करें तो स्वाभाविक रुप से हम भी वही पहुँचते हैं जँहा श्रीकृष्ण जाने के लिए कहते हैं।

निष्काम भाव से कर्म करते करते आत्मवान बनने की शिक्षा देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन और अर्जुन के माध्यम से हम सबको  समझाते हैं कि जब हम आत्मवान होते हैं अर्थात जब हम नियत तरीके से जीवन को जीते हैं , जैसा कि ऊपर बतलाया गया है तब हम मन बुद्धि और कर्म यानी तीनों गुणों से मुक्त होकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जैसा कि पूर्व में श्रीकृष्ण बता आये हैं कि आत्मशोधन की इस यात्रा में हम अपनी इन्द्रियों और उनसे जनित सुखों से अलग होते जाते हैं, समत्व के भाव में आते जाते हैं, ऐसी स्थिति में वो धार्मिक विधि  विशेष भी बहुत महत्व नहीं रखती जिससे हम इस लोक या परलोक में सुख की अपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में सांसारिक सुखों की कामनाओं से युक्त वेदों का भी उस व्यक्ति के लिए विशेष महत्व नहीं होता। परम् सुख की अवस्था में ये सब अब निष्प्रभावी लगने लगते हैं।

  जब मनुष्य इस परम् लक्ष्य के मार्ग पर चलता है तो मार्ग के छोटे छोटे लक्ष्यों की प्राप्ति से उसे कोई बहुत मतलब नहीं होता है।  इस प्रकार से जब हम कार्य करने हेतु प्रवृत्त होते हैं तो चूंकि इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण और उनसे उत्पन्न प्रभाव भी अत्यल्प से अत्यल्प होते जाते हैं  हमारे अंदर सत्वगुण की मात्रा बढ़ती जाती है जिसके कारण हम परम् की यात्रा के दौरान जो कुछ अन्य कार्य भी करते हैं उनका सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है भले इनसे हमें कोई विशेष मतलब हो नहीं हो। 

   इसीप्रकार चूँकि आतंबोध की यात्रा में द्वंद्व को छोड़ते जाते हैं हमारी बुद्धि भी साथ साथ अपनी बेचैनी को भी छोड़ते जाते हैं। इस तरह से हमें जीवन की विषमता प्रभावित नहीं कर पाते।

      इस अवस्था में जब व्यक्ति अपनी यात्रा को पूरी करता है उसे परम् सुख और शांति प्राप्त होती है। ध्यान रहे जब तक व्यक्ति इस अवस्था को नहीं पाता तब तक वह उन चीजों में सुख खोजता है जो उसके बाहर इस संसार में है।  एक ही वस्तु कभी उसे अच्छी लगती है तो कभी किसी अन्य अवस्था में वही चीज उसके लिए सूखकर नही रह जाता। जो आज प्रिय है कल अप्रिय। इस प्रकार वस्तु तो वही रहता है परंतु व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था में परिवर्तन के कारण उसे कभी पसन्द कर सुख प्राप्त करता है तो कभी नापसन्द कर दुखी भी होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सुख हमारे बाहर नहीं होता है। मन की शांत अवस्था में जब हम द्वंद्व से मुक्त होते हैं हमें उस सुख-शांति की प्राप्ति होती है जो किसी वस्तु या मानसिक अवस्था में परिवर्तन पर नहीं निर्भर करते हैं। ये अवस्था आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में मिलती है। इस कारण से इस प्रकार के व्यक्ति के जीवन में भौतिक सुख देने वाले भोग विलास सुख सुविधा का कोई महत्व नहीं होता है। जिसे अपनी परम्  अवस्था प्राप्त हो जाती है उसे तो सुख ही सुख है तो जो भी सुख उसे अन्यत्र भौतिक रूप से मिल सकता था वो भो उसके परम् अवस्था में स्वतः सम्मिलित होते हैं।

  ध्यान रहे गुणातीत यानी गुणों से मुक्त होने की ये अवस्था अचानक ही नहीं प्राप्त होती है, बल्कि ये अवस्था क्रमिक रूप से ही मिल सकती है, क्रम क्रम से ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होता है, समत्व में आता है, विपरीत प्रभावों के द्वंद्वात्मक जोड़े के प्रभाव को खत्म करता है। सो उस अवस्था में पहुँच जाने के बाद भी इस क्रम का महत्व बना रहता है। दूसरे व्यक्तियों को भी अगर उस अवस्था में पहुंचना है तो इसी क्रम को अपनाना है।

कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। 

      श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।

      ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं-----

1.जब हम कर्म करते हैं तो हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में होता है उसके परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता है। श्रीकृष्ण पहले समझा आये हैं कि जब हम कर्म करें तो हमारी बुद्धि एकनिष्ठ होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हम तरह तरह की उम्मीद पाल बैठते हैं, तरह तरह के लक्ष्य बना लेते हैं जिसका नतीजा होता है कि हम सदा उनको पूरा करने की दौड़ धूप में लगे रहते हैं, हमारा मन हमारी इन्द्रियों  से मिलने वाले तरह तरह के अनुभवों से बेचैन हुआ रहता है। जब मन विभिन्न   लक्ष्य की पूर्ति हेतु भटकता रहता है तो फिर मन में शांति नहीं होती और बिना शांति के हम परम् लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वस्तुनिष्ठ ढंग से ध्यानमग्न नहीं हो पाते। थोड़ा ये भी मिल जाये, थोड़ा वो भी मिल जाये, थोड़ा उसे भी प्राप्त कर लिया जाए, अच्छा जब ये पूरा कर लेते हैं तब उस परम लक्ष्य के बारे में सोचेंगे, फिर वह मिला नहीं कि दूसरा काम आ गया है पहले उसे कर लें, थोड़ा और भोग की वस्तु को इकठ्ठा कर लें तो थोड़ा वो भी कर लें। ऐसी स्थिति में शांति कँहा!

   इस स्थिति में हम अपने गुणों-तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण की अवस्था के अधीन होकर उनके अनुसार अपनी क्रियाएँ करते रहते हैं और मानसिक रूप से उद्वेलित हुए रहते हैं। यदि परम् लक्ष्य की चाह है तो इस गुणों से मुक्त होना ही होगा और तभी साँख्य की प्राप्ति होगी। इस हेतु जरूरी है कि हम ध्यान करें ।लेकिन क्या जबरन ध्यान सम्भव है?  कदापि नहीं। होता ये है कि हम अपने स्व की तलाश में  सुख चाहते हैं। लेकिन जब तक अपने तीनों गुणों के प्रभाव में होते हैं हम अपने वास्तविक सेल्फ यानी आत्मबोध को नहीं पहचान पाते। तब हम सुख की चाहत में अपने बाहर देखते हैं, अपने बाहर भटकते हैं, जो हमारे बाहर है उसमें हम सुख खोजते हैं जँहा हमारी खुशी , हमारा सुख होता ही नहीं। वो तो हमारे अंदर है जिसे हम उपासना और ध्यान कर ही प्राप्त कर सकते हैं। और ये अवस्था जबरन नहीं हासिल होती है। ये अवस्था सही कर्म कर के ही मिलती है, सही ढंग से कर्मपथ पर चलकर ही हम सब उस अवस्था में पहुंचते हैं जँहा ध्यान करने के अधिकारी बन पाते हैं। बिना गुणों से पार पाए ध्यान सम्भव नहीं । यदि हम करते हैं तो जितनी देर ध्यान करते हैं हमारे मन में कुछ न कुछ चलते रहता है, हमारे अंदर की इक्षाएँ जोर मरती रहती हैं। जिनसे निकलने का एक मात्र तरीका गुणों के प्रभाव से मुक्त होना ही है। लेकिन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो तो कैसे हों? ये प्रश्न तो है। इसका इकलौता तरीका है कि हम सही तरह से कर्म करें , निर्धारित तरीके से कर्म करें। तब जाकर हमको  वह अवस्था मिलती है जब हम कर्मों से मुक्त हो पाते हैं। तभी हमें आत्मसाक्षात्कार हो पाता है। यदि हम बीच में चाहें कि आत्मसाक्षात्कार हो जाये और इसके लिए हम कर्म का मार्ग छोड़ दें तो मुँह के बल गिर जाएंगे अर्थात हमारा पतन हो जाएगा, हम पथभ्रष्ट हो जाएंगे। अतएव कर्म कर के ही हम उस ऊंचाई को प्राप्त कर सकते हैं जँहा पहुँच कर हम कर्म को छोड़ भी देते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तब हम आत्मसाक्षात्केकार की स्थिति में होते हैं। 

     उपरोक्त से स्पष्ट है कि यदि हम अपना वास्तविक स्वरूप जानना चाहते हैं , आत्मबोध करना चाहते हैं , ब्रह्म को पाना चाहते हैं, वो सुख चाहते हैं जिसे प्राप्त कर कभी दुखी न हों , ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं, मोक्ष चाहते हैं तो हमको सबसे पहले कर्म ही करना होगा क्योंकि कर्म करके ही हम अपने अंदर के तीनों गुणों को समाप्त कर सकते है और जब ये गुण खत्म हो जाते हैं तब हम साफ नजर से अपनी आत्मा यानी अपने स्व को देख समझ पाते है और तभी हम आतंबोध भी कर पाते हैं। 

   सो आतंबोध की यात्रा में पहली अनिवार्य शर्त है कर्म करना।

2. ये स्पष्ट है कि हमारा अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम क्या होगा ये हमारे अधिकार से बाहर है। हम मात्र कर्म कर भर  सकते हैं परिणाम तो प्रकृति देती है। 

   जब हमारा अधिकार  कर्म करने भर पर है तो फिर तीन परिस्थिति में से कोई एक हो सकती है

  (क) हम कर्म कर सकते हैं,

  (ख) हम कर्म नहीं कर सकते हैं

  (ग) हम कर्म किसी अन्य तरीके से भी कर       सकते हैं। 

        हमारे मन में तरह तरह के विचार आते रहते हैं। ये विचार हमारे  समय , काल और परिस्थिति के अनुसार तो होते हैं और बराबर बदलते भी रहते हैं। इन विचारों की गुणवत्ता हमारे अपने गुणों की अवस्था पर भी निर्भर करती है और प्रतिक्रिया स्वरूप हम क्या करते हैं उन विचारों के साथ ये भी हमारे समय, काल, परिस्थिति और हमारे गुणों की अवस्था पर निर्भर करता है। एक ही विचार के प्रति एक ही व्यक्ति की अलग अलग परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया हो सकती है और अलग अलग व्यक्तियों की भी प्रतिक्रिया अलग अलग हो सकती है। ये व्यक्ति के अपने समय, काल और परिस्थिति और उसके तीनों गुणों के अनुपातिक  प्रभाव के अनुसार ही होती है। इस प्रकार अपनी इक्षाओं के प्रति हमारी क्या प्रतिक्रिया है ये इन्हीं चार चीजो से तय होती है , हम इक्षा के प्रति समर्पित हो सकते हैं, उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं और खुद को किसी अन्य चीज में भी व्यस्त कर सकते हैं।इस प्रकार कर्म पर हमारा अधिकार होता है जो हम अपने समय , काल, परिस्थिति और गुणों की  परिस्थिति पर निर्भर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्मों को करने पर हमारा अधिकार है और जो हम करते हैं उसके लिए हम ही उत्तरदायी भी हैं। यदि हम अपने गुणों के सम्बंध में सचेत रहते हैं, तमोगुण और रजोगुण को नियंत्रित कर सत्वगुण की मात्रा को बढ़ाते है तो फिर हमारे कर्मों की कोटि भी उत्तम होगी। 

3.परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता। हम जो करते हैं उसपर तो हमारा नियंत्रण है लेकिन परिणाम कई ऐसी चीजों पर निर्भर करता है जिसके बारे में हमें कुछ भी जानकारी नहीं होती। ध्यान रहे  we perform action, we don't perform results; results come. जब परिणाम पर हमारा अपना कोई अधिकार ही नहीं तो फिर परिणाम पर क्यों माथापच्ची करना। हमारा अधिकार कर्म पर है तो हमारी सारी सावधानी कर्म करने में ही होनी चाहिए।

4. इसके आलोक में परिणाम , जिसपर हमारा वश नहीं उसके प्रति कोई मोह रखना भी तो गलत ही है। सो हमें चाहिए कि हम अपने कर्मों को कर उनसे सुख को प्राप्त करें क्योंकि ये कर्म ही हैं जिनको हम अपने अनुसार कर सकते हैं, परिणाम के सम्बंध में तो कोई निश्चितता नहीं है, सिर्फ अनुमान भर ही लगा सकते हैं। सो हमें चाहिए कि हम आने कर्मों को कर उनसे सुख प्राप्त करें। यदि हमारी स्पृहा परिणाम में लगी रहेगी तो देखिए कितनी बड़ी मूर्खता हम करते हैं। जिस चीज पर हमारा वश है उसको तो कर हम सुख नहीं प्राप्त कर रहें और जिस परिणाम पर हमारा कोई वश नहीं उसकी चिंता में हम गले जा रहें हैं , उससे भी सुख नहीं मिल रहा है। 

5.इसे अन्य प्रकार से भी देखें। कर्म हम वर्तमान में करते हैं और परिणाम भविष्य में आता है। अब देखिए, वर्तमान में किये जा रहे कर्म से हमें सुख नहीं मिल रहा है और हम सुख के लिए परिणाम पर निर्भर हो कर अपने ही कर्मों से मिल सकने वाले सुख को भविष्य में मिलने वाले अनिश्चित परिणाम पर टाल रहें हैं। इस प्रकार हम खुद ही अपने से अपने सुख को विलग कर रहें हैं। भला ये कौन सी समझदारी है!! अब सोचिए कोई एक काम करता है और सोचता है कि इस काम का जब उसके मनोकुल परिणाम आएगा तब वो खुशी मनाएगा। इस प्रकार उस काम को करने से मिल सकने वाली खुशी को वो खुद ही बर्बाद कर देता है इस उम्मीद में कि जब उसे भविष्य में मनोकुल  परिणाम  मिलेगा तो वो खुश होगा। अब सोचिए यदि उसे मनोकुल परिणाम मिल जाये तो क्या हो सकता है। सुख के एक निष्चित अवसर को उसने गँवा कर इसे वो प्राप्त करता है। ये भी सम्भव है कि जब उसे वो इक्षित परिणाम मिले तब तक उसकी परिस्थिति, उसकी आवश्यकता, उसके मनोभाव ही बदल चुके हों और इक्षित परिणाम मिलने पर भी वो सुख न प्राप्त कर सके। ये भी सम्भव है कि उसे मनवांछित परिणाम मील ही न पाए। तब तो वो व्यक्ति दोगुने दुख को ही न अनुभव करेगा! अगर हमारा सुख हमारे कर्म में नहीं अनिश्चित परिणाम में है तब तो हम जीवन भर  निश्चित कर्म वाले सुख को छोड़कर उसी अनिश्चित परिणाम वाली अनिश्चित खुशी के लिए इधर से उधर भागते रह जाएंगे।

6.एक और बात अति महत्वपूर्ण है। यदि हम कर्म को छोड़कर उसके परिणाम पर ही केंद्रित रहते हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि हम वर्तमान से अधिक भविष्य की चिंता में जी रहें हैं । कर्म तो हम आज करते हैं , लेकिन भविष्य में मिलने वाले परिणाम से लगाव के कारण हम चाहते हैं कि हम भविष्य में भी रहे  और भविष्य में भी कर्म करते रहे और इस प्रकार हम खुद को कर्मों के बंधन में बाँध लेते हैं, उनसे मुक्त नही हो पाते। कर्मों के इसी बन्धन से तो पुनर्जन्म का सिद्धांत निकल कर आता है । तब भला आत्मसाक्षात्कार का कँहा अवसर मिलता है। तब तो हम कर्मों से मिलने वाली शांति भी गँवा देते है।  और हमेशा एक उत्तेजित मानसिक अवस्था में रहते हैं। इस प्रकार हम खुद को गुणों  में बाँध कर रखते हैं। इस बन्धन के कारण हम आत्मसाक्षात्कार से वंचित हुए रहते हैं।

7. तो क्या कर्मों को त्यागने से परिणाम की चिंता खत्म हो जाएगी? चूँकि लगाव परिणाम से है सो उस मोह के कारण चिंता तो खत्म नहीं होगी, उल्टे कर्मों को नहीं करने से कर्म कर अपने गुणों से मुक्त होने, सुख को प्राप्त करने और अंततः आत्मसाक्षात्कार करने के अवसर को भी हम गँवा देते हैं। 

          कर्मयोग को समझने के लिए ये एक अतिमहत्वपूर्ण पड़ाव है जँहा यदि हम इसे नही समझ सके तो फिर कभी नहीं समझ पाएंगे, सो जरूरी है कि इसे आत्मसात करने के लिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण की शिक्षा को बारंबार पढ़ें, अपने जीवन चरित्र में अभ्यास में लाये।

पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म करने के सम्बंध में चार बाते समझाई हैं

1.आपका अधिकार मात्र कर्म करने में है।

2.फल पर आपका कोई अधिकार नहीं है।

3.फल से लगाव मत रखें। फल भविष्य में मिलता है, सो फल के लगाव से मुक्त होकर आप भविष्य के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

4.कर्म नहीं करने में आपकी कोई श्रद्धा नहीं हो।

    ये चारों बातें जिस चीज को समझाती हैं उनको श्रीकृष्ण एक बार फिर से कहते हैं कि आपको कर्म तो करना  लेकिन उसे योग भाव से करना है। इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि ये योग है द्वंद्वात्मक विलोम के युग्मों से मुक्त होकर कर्म करना अर्थात जय-पराजय, लाभ-हानि, हर्ष-विषाद, सफलता-असफलता, रिद्धियों-सिद्धियों से मुक्त होकर कर्म करना,। यानी परिणाम जो हो सभी में समान भाव रखकर कर्म करना। हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है, फल के निर्धारण में नहीं। सो फल के चरित्र से मुक्त होना चाहिए कर्म करते वक्त। मतलब समान भाव अर्थात समत्व योग! हमारा कर्तव्य है अपने कर्मों को सही ढंग से करना न कि किये गए या किये जा रहे या किये जाने वाले कर्मों का परिणाम सोचकर करना। जो उचित है, सत्य है, अर्थात जो rigjteous है उसे करना, भले परिणाम जो हो। 

 ध्यान रहे WE SHOULD DO WHAT IS RIGHT AND NOT WHAT IS OUR LIKE. जरूरी नहीं कि हम जो पसन्द करते हों वो सही भी हो। जो सही नहीं नहीं है , जो धर्मानुकूल नहीं है वो भले हमें प्रिये हो हमें नही। करना चाहिए। सनद रहे कि हमें अपने कर्मों पर ही अधिकार है, परिणाम पर नहीं। चूँकि हमें ये अधिकार है कि हम सही या गलत जो कर्म चाहें कर सकते हैं तो फिर हमें फिर सही , (righeous) कर्म ही करना चाहिए भले ही हो सकता है कि उस कर्म का वो परिणाम हमें नहीं मिल पाए जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। वस्तुतः हमको तो इसी उम्मीद को त्यागने की शिक्षा श्रीकृष्ण दे रहें हैं क्योंकि उम्मीद तो एक अनुमान भर है जो हमारे अधिकार से बाहर है, जिसके पूरा होने या न होने पर हमारा कोई वश नहीं है।

        इस प्रकार कर्म करने में कर्मयोग की शिक्षा के अनुसार निम्न पाँच तरह की सावधानियों  को बरतने की जरूरत होती है:-

1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।

2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।

3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।

4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।

5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 

      इन सभी के संयोग से किया गया कर्म ही कर्मयोग है जिसे कर के साँख्य यानी परम् ज्ञान की प्राप्ति होती है जो अपनी आत्मा का साक्षात्कार कराता है। 

श्रीकृष्ण ने गत समझाया कि किस तरह कर्मयोग की बुद्धि में परिणाम के मोह से मुक्त रहकर कर्म करना होता है और किस तरह इस तरह कर्म करते करते हम कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने सत्य यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं , अपने ईगो से आगे बढ़कर अपने सेल्फ को पाते हैं। इस हेतु कर्मयोग की बुद्धि में समत्व का विशेष महत्व होता है अर्थात परिणाम से लगाव का अभाव। हम अच्छे से अच्छे परिणाम का प्रयास करें, निशित करे। करें यानी कर्म करे, करने के पूर्व अपने स्वधर्म के अनुसार सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करने की योजना भी बनाये लेकिन कर्म करते वक़्त समत्व की बुद्धि से कर्म करें, यानी उसी परिणाम से लगाव को त्याग दें। तभी  हम कर्मयोग की बुद्धि से कर्म कर पाएंगे। इसी स्थिति में हम अपने अंदर से प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। ये प्रसन्नता हमारे अंदर से निकलती है जो चिरस्थाई होती है क्योंकि उस समय हम अपनी आत्मा में ही अवस्थित होते हैं जो हमारा परम् लक्ष्य रहा है। लेकिन जो व्यक्ति इस बुद्धि से कर्म नहीं करते वे तो परिणाम से ही सुखी और दुखी होते रहते हैं, कर्म की गुणवत्ता से उनको प्रसन्नता नहीं मिलती। वे तो भविष्य में मिलने वाले परिणाम से सूखी या दुखी होते रहते हैं। ऐसे लोग परिणाम से बंधे होते हैं। वे अपने कर्म से नही। आनंदित होते हैं। वे इंतजार करते हैं अच्छे परिणामों की ताकि वे प्रसन्नता को पा सकें। उनके लिए अनेक लक्ष्य होते हैं और हर लक्ष्य के परिणाम से सुखी दुखी होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था भी विचलित होते रहती है। ध्यान रहे , परिणाम तो भविष्य में मिलता है। हम जो कर्म पहले किये थे उसका परिणाम आज मिलता है। अब यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिला तो आज का भी कर्म हम अच्छे से नही कर पाते सो आज के कर्म का भी परिणाम हमारे मनोकुल नहीं आने वाला। इस प्रकार भविष्य में प्राप्त होने वाले परिणाम से बंधकर हम खुद को भविष्य से बाँध लेते हैं। चूँकि ऐसे लोग प्रसन्नता और स्थायित्व अपने बाहर खोजते हैं तो नित परिवर्तनशील संसार के परिवर्तनों से हम सुखी दुखी होकर अस्थिर होते रहते हैं। ऐसे में सत्य यानी आत्मा यानी सेल्फ यानी चिरस्थाई प्रसन्नता कँहा मिलने वाली।


     इस प्रकार कर्मयोग से युक्त कर्म और सामान्य कर्म में कर्म में प्रयुक्त बुद्धि या दृष्टिकोण का महत्व होता है। मनुष्य हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहता है। लेकिन जिस कर्म में कर्मयोग की बुद्धि सन्निहित होती है अर्थात जो कर्म कर्मयोग की उपरोक्त बुद्धि से युक्त होकर किया जाता है अर्थात जिसे करने में स्वधर्म, समत्व, असंगत, समर्पण और प्रसाद बुद्धि होती है वो कर्म तो कर्मयोग का कर्म है जो अंतिम सत्य तक पहुँचाता है, शेष जो इन बुद्धियों या दृष्टिकोण से युक्त नही होते वे सामान्य कर्म हैं जो पीड़ादायक होते हैं। इसलिए ये सामान्य कर्म निम्नकोटि के होते हैं।


      जब भी हम कोई कर्म करते हैं दो तरह के परिणाम मिलते हैं, एक हमारे बाहर और दूसरा हमारे अपने अंदर। यदि हम बाहरी परिणाम से प्रभावित होते हैं तो परिणाम के स्वरूप के अनुसार कभी सुखी होते हैं तो कभी दुखी क्योंकि दोनों तरह के परिणाम मिलते रहते हैं। बाहरी संसार तो हमेशा परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन के कारण हम भी परिवर्तित होते रहते हैं क्योंकि हम इनके प्रभाव में होते हैं। लेकिन यदि हम आंतरिक परिणाम के वश में हों, बाहरी परिणाम में समत्व हो, उनसे असंगत हों तो फिर हम अपने कर्म से ही आनंदित होते रहते हैं, स्थायित्व रहता है हममे जो हमें चिर आनंद की तरफ ले जाता है। 


   यदि बाहरी परिणाम हमपर हावी हैं और परिणाम बुरा आ गया तो हममे अपने कर्म के प्रति , अपने मानसिक अवस्था के प्रति नकरात्मकता आ जाती है। ये नकस्रात्मकता आगे के कर्मों को भी दूषित कर देती है। नतीजा होता है कि इस नकस्रात्मकता से बाहर आना सहज नहीं रह जाता। ये तभी सम्भव हो पाता है जब हम कर्मयोग की बुद्धि का अभ्यास शुरू करते हैं। आइये देखते हैं कि कर्मयोग से हीन बुद्धि के अनुसार कर्म करने से किस तरह से हम नकारात्मकता को प्राप्त होते हैं, किस तरह से हमारा पतन हो जाता है।


1.जब हम अपने स्वधर्म  के अनुसार ही  करटे हैं तो सही कर्म करते हैं । इस तरह के कर्म में हम ध्यान रखते की हम धर्म के अनुसार ही कोई कार्य करें। इसके विपरीत जब हम स्वधर्म का ख्याल रखे बिना कोई कर्म करते हैं तो हम अपनी पसंद नापसन्द के अनुसार कोई कर्म करते हैं। ऐसी स्थिति में हमें धर्म का ध्यान नहीं रहता बल्कि हमें जो अच्छा लगता है वही करते हैं। इस स्थिति में हम अपने मोह, माया ,आवेश, गर्व, अहंकार, भ्रम, मित्रता, शत्रुता , भय आदि के भाव के वश में होकर कर्म करते हैं। इस तरह के कर्म से उद्धार की बात सोचना भी बेमानी ही है।

2.जब हमारे कर्मों में समत्व का भाव होता है तो परिणाम से लगाव के बिना बड़ी निश्चिंतता से हम कर्म भी करते हैं और करने वक़्त आनंदित भी रहते हैं। ये आनंद परिणाम में नहीं कर्म में निहित होती है। लेकिन जब हम समत्व के भाव के बिना कर्म करते हैं तो परिणाम के लिए ही कर्म करते हैं। तब हम कर्म करने वक़्त उत्तेजित और बेचैन हुए रहते हैं। हम नसम की अवस्था में होते हैं , परिणामतः अपने कर्मों से हम भी हम असन्तुलन ही पैदा करते हैं.

3.जब हमारे कर्म में ईश के प्रति समर्पण का भाव होता है तो हम बड़े कैनवास पर काम करते हैं। हमारे कर्मों का उद्देश्य जीव का कल्याण होता है। लेकिन जब ये समर्पण ईश के प्रति न होकर खुद के प्रति ही होता है तब हम जो भी करते हैं उसमें अपनी भलाई का भाव रहता है। तब हम ये नहीं सोचते कि जो हम कर रहें हैं उससे समाज का कितना भला होगा, जीव मात्र का कितना भला होगा। ये संकुचित दृष्टिकोण स्वार्थ को जन्म देता है जिससे जन कल्याण की बात हम नहीं सोच पाते। ऐसी स्थिति में हमारे कर्मों से समाज को नुकसान नुकसान पहुंच सकता है।

4. जब हम परिणाम से असंगत होते हैं अर्थात उससे जुड़े नहीं होते तो परिणामों का हमपर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। लेकिन जब हमारे कर्मों में असंगत का भाव नहीं होता तब हम अपने कर्मों के परिणाम के अनुसार ही प्रतिक्रिया भी देते हैं और आगे का अपना कर्म भी निर्धारित करते हैं। यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिले तो हम दुखी हो जाते हैं, गुस्सा से भर जाते हैं, और अपने अगले बगल के लोगों को भी  अपने  व्यवहार से विचलित कर देते हैं। इस तरह जब हम परिणाम से बन्ध जाते हैं तो लगता है कि जो करते हैं हम ही करते हैं, और परिणाम स्वरूप सभी को कोसने लगते हैं। हमारे अगल बगल का भी माहौल खराब हो जाता है। खुद हम भी आगे के अपने कर्म पूर्व के परुणामों के अनुसाय तय कर किसी का भी बुरा करने पर उद्धत हो जाते हैं।

5. प्रसाद बुद्धि से युक्त कर्म में जो भी परिणाम प्राप्त होता है उसे स्थिर भाव से हम स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत प्रसाद बुद्धि से हीन कर्म में कर्म के परिणामस्वरुप जो भी हमें मिलता है उससे हमें असन्तोष ही बना रहता है, जिसके कारण हमारी मनः स्थिति हमेशा दुख की बनी रहती है। हम चिरसन्तोषी और चिर दुखी हुए रहते हैं। प्रसन्ता के साथ स्वीकार नहीं करने के कारण हम हमेशा हमेशा दुःखी ही बने रहते हैं।

  इन कारणों से कर्मयोग के बुद्धि से विहीन कर्म हीन ही है। सो इसे त्यागने में ही भलाई है। अतः हमें सामान्य  कर्मों को छोड़कर इस कर्मयोग की बुद्धि ही अपनानी चाहिए। तभी हमारा कल्याण सम्भव है। तभी हम कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त हो सकते हैं । अन्यथा सामान्य कर्मों को करते हम हमेशा कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं। ध्यान रहे कर्म करना कर्मयोग नही है। कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करना ही कर्मयोग है। जो ऐसा नहीं कर पाते वे कृपण हैं अर्थात कंजूस हैं। उनमें क्षमता तो होती है लेकिन वे इस क्षमता का उपयोग नहीं करते और स्व यानी अपनी आत्मा को नहीं पहचान कर बन्धन में बंधे रह जाते हैं।

श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि को स्पष्ट कर देने के बाद इस बुद्धि की अन्य विशेषता पर प्रकाश डालते हुए आगे कहते हैं कि मनुष्य को लगता है कि इस जीवन में उसके द्वारा अर्जित पूण्य और पाप की उसकी उपलब्धि हैं। लेकिन हमारे पूण्य और पाप भी इसी जन्म कर्म के बंधन हैं जो हमें हमारा सेल्फ यानी आत्मा का बोध नहीं करा पाते। परिणामों के बंधन ने बन्धा मन आत्मसाक्षात्कार करने में असमर्थ होता है। लेकिन यदि हममे कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार कर्म करने की कुशलता आ जाती है तो हम इस पाप पुण्य के द्वंद्वात्मक युग्म से बाहर निकल आते हैं क्योंकि तब हमारे पास परिणाम के प्रभाव से मुक्त रह पाने की दक्षता होती है।

   जब हम परिणाम से बढ़ी नहीं होते तो भविष्य की चिंता से न तो खुश होते हैं न दुखी। इसी प्रकार अतीत के प्रभाव से भी हम मुक्त रहते हैं क्योंकि अतीत के कर्मों का ही परिणाम भविष्य में मिलता है। सो हमारी दृष्टि मात्र वर्तमान के कर्म पर टिक जाती है और हमारा सारा प्रयास उस कर्म को उच्च कोटि का बनाने में होता है। पाप और पुण्य तो अतीत के कर्म और भविष्य के फल हैं लेकिन जब इनसे हम पार चले जाते हैं तो हमारी दृष्टि वर्तमान पर ही होती है, जब हम कर्मयोग की बुद्धि से युक्त कर्म पर ध्यान देते हैं और इसे कर हम बन्धन से मुक्त होते हैं। 

कर्मयोग बुद्धि के परिणामों को बताते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जब इस तरह की समत्व की बुद्धि  प्राप्त व्यक्ति ही ज्ञानी कहलाता है। परिणाम से निर्विकार व्यक्ति के लिए परिणाम बन्धनकारी नही हो पाते। जब हम फल से बँधे रहेंगे तब न हमें परिणामों के कारण सुख या दुख की अनुभूति होगी। जब परिणाम का बंधन ही नहीं तो फिर उनके कारण सुख या दुख कैसा! इस स्थिति में तो हमें सिर्फ कर्म करने से प्राप्त अवश्यम्भावी प्रसन्नताआ ही मिलती है। समर्पण के साथ एवम स्वधर्म के अनुरूप किये गए कर्म में तो कर्म करने में प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। सो हम चिर प्रसन्न रहते हैं। दुख या क्षणिक सुख देने वाला परिणाम तो बेअसर है समत्व बुद्धि वाले ज्ञानी व्यक्ति पर। इस तरह की चिरस्थाई प्रसन्नता मन को स्थिर करती है। स्थिर मन व्यक्ति ही अपने स्व यानी आत्मा यानी सेल्फ को देख समझ पाता है। सुख दुख के बीच झूलते व्यक्ति की बुद्धि, मन, दृष्टि आदि सभी चायमान होते हैं। सारी इन्द्रियाँ एक साथ ही सक्रिय हुई होती हैं। आप खुद अपनी ही अवस्था पर दृष्टि डाल लें। क्षण में इधर, क्षण में उधर। मन के अंदर भारी उथल पुथल और कोलाहल रहता है परिणामों या परिणामों की उम्मीद अथवा आशंका से। लेकिन परिणाम से निर्विकार समत्व बुद्धि युक्त व्यक्ति शांतचित्त, प्रन्नचित्त, रहते हुए स्वम् की अनुभूति में लीन रहता है। अपने स्व के माध्यम से वह खुद को परमात्मा के समीप पाता है। जब व्यक्ति परमात्मा के समीप ही है तो फिर उसे जन मृत्य के बंधन कैसे बाँध सकते, वह तो इनसे मुक्त रहता है। आप याद करें प्रारम्भ में अर्जुन युद्ध करने से क्यों मना कर रहा था? उसकी दृष्टि युद्ध यानी कर्म पर नहीं थी, उसकी दृष्टि युद्ध के परिणाम पर थी जिसमें उसे जय और पराजय दोनों से मिलने वाले परिणामों से असन्तुष्टि थी। वह सम्भावित परिणामों से निर्विकार नहीं होता बल्कि उनसे बन्धनकारी ही मानता है तभी तो दुखी हो रहा था, तभी तो त्रिलोक का साम्राज्य मिल जाने वाला परिणाम भी उसे स्वीकार नहीं था। लेकिन ये उसके परिणामों के साथ गहरे बन्धन के कारण था। लेकिन श्रीकृष्ण तो यँहा उसे कर्मबुद्धि के द्वारा जन्म मृत्यु के चक्र से ही छूट जाने का ज्ञान दे रहे हैं जो उन परिणामों से बहुत आगे है। 

  सो हमारा उद्देश्य समत्व की प्राप्ति होनी चाहिए न कि क्षुद्र परिणामों पर हमारी नजर होनी चाहिए।

जब व्यक्ति परिणामों से विच्छेदित होना सिख लेता है तब उसमें मोह नहीं रह जाता। जब आपका मोह समाप्त हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि तब आपको परिणाम से लगाव नही। रह जाता।  परिणामों के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति को किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। तो क्या ये सम्भव है? सुनने में तो ये सम्भव नहीं लगता कि परिणाम के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त होकर भूत , वर्तमान और भविष्य की सारी आसक्तियों से मुक्त भी हुआ जा सकता है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि परिणाम के प्रति आकर्षण बना हुआ है। लेकिन जैसे जैसे अभ्यास करते जाते हैं धीरे धीरे परिणाम की चिंता कम से कमतर होती जाती है। कर्मयोग की बुद्धि का निरन्तर अभ्यास परिणामों के प्रभाव को कम करता है। इस बुद्धि को , यानी इस ज्ञान को सतत स्मरण में रखिये। कर्म की महत्ता को समझने से परिणाम की चिंता कम होती है। जब व्यक्ति की कर्मयोग की बुद्धि व्यक्ति के अंदर के परिणाम से लगाव की आसक्ति को पार कर जाती है तो भूत, वर्तमान और भविष्य की समस्त आसक्ति समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति इस अवस्था में  पहुँचता है तब माना जाता है कि वह वैराग की अवस्था में आ गया है।

यहाँ सावधानी बरतने की जरूरत है। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण ने अभी जिस वैराग्य की चर्चा की है वह किस चीज से है?  भोगो से वैराग्य की बात कही गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। भोग परिणाम ही हैं कर्म के। परिणाम के प्रति समत्व में स्थित व्यक्ति को जब परिणाम प्रभावित करने में असमर्थ हो जाते हैं तो वह वैराग्य की अवस्था है। सनद रहे इस वैराग्य में कँही भी कर्म से वैराग्य की बात नहीं की गई है, अतएव हमें इस भ्रम में कभी भी नहीं पड़ना चाहिए कि श्रीकृष्ण कर्म से विरत होने को कह रहे हैं, वे मात्र कर्म के परिणाम में समत्व की ही शिक्षा दे रहें हैं। इस अवस्था में मन शांत हो चलता है और तब हम इस अवस्था में आ जाते हैं कि हम सेल्फ को यानी अपने वास्तविक रूप को समझ पाए कि दरअसल हम कौन हैं। स्वयम को जान लेना ही सबसे बड़ा ज्ञान है क्योंकि स्वयं का ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान होना है।  व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य भोगों ( धनात्मक और ऋणात्मक दोनों,) को ही भोगना नहीं है। जब हम कर्म करते हुए परिणाम के प्रति समत्व की भावना रखते हूं अर्थात अच्छे परिणाम से प्रसन्न नही। होते और बुरे परिणाम से दुखी नहीं होते बल्कि दोनों को समान भाव रखते हैं तो मन शांत होता है। इस अवस्था में जीवन में मिल चुके, मिल रहे और मिल सकने वाले भोगों से भी नही। प्रभावित नहीं होते। ये वैराग्य की अवस्था है, जिसमें मन, चित्त शांत होता है, आनंदित रहता है और यही सत्य की अवस्था है अर्थात हमारा सच्चिदानंद स्वरूप इसी अवस्था में हमें मिलता है।

       ये बातें थोड़ी रहस्यमयी लग सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे जब तक हम मोह में लगे हैं , परिणाम में हमारी आसक्ति बनी हुई है तभी तक ये बातें रहस्यमयी प्रतीति होती हैं । जैसे ही कर्मयोग के अभ्यास से हम परिणाम जनित प्रभाव से हम खुद को अलग करते हैं प्रसन्नता अनुभव करते हैं , मन शांत और हल्का हो जाता है। दैनिक जीवन के एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आप छोटे बच्चों के साथ खेल रहें हैं और बच्चे आपको हरा देते हैं। आप हार कर भी दुखी नही होते। उसी प्रकार यदि आप बच्चों को हरा देते हैं तो भी आप फरव  नहीं करते। बल्कि आप तो दोनों परिणामों को समान रूप से लेते हैं और परिणाम के प्रभाव में नहीं होते। इसे विस्तारित करने पर हम अपने कर्म में इसे देख समझ सकते हैं। मनुष्य का जीवन ही अपने स्व की प्राप्ति के लिए हुआ है। यदि हम आप कर्म में स्वधर्म और समर्पण से रत हैं और परिणाम के प्रभाव से मुक्त हैं तो इसी वैराग्य की अवस्था में हैं। वैराग्य के लिए न तो कोई उम्र निर्धारित है, न ही विशेष भेषभूषा या कोई विधि विशेष हीं। वैराग्य को श्रीकृष्ण ने जिस तरह यँहा प्रस्तुत किया है वह एकदम अनुकरणीय है बशर्ते कि कर्मयोग का अभ्यास करते करते हम अपनी बुद्धि पर पड़े माया और मोह के आवरण को हटा सकें। कर्मयोग का आचरण करने पर ऐसा होगा ही ये भी निश्चित ही है।

अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जिज्ञासा होती है, जानने की इक्षा होती है। यही जिज्ञासा व्यक्ति को अन्वेषण के मार्ग पर ले जाती है। इस संसार में कर्म करने के सम्बंध में भी तरह तरह के सिद्धान्त, ज्ञान मौजूद हैं। व्यक्ति अपने जिज्ञासा वश इनके सम्पर्क में आता है और भाँती भाँति के तर्कों को सुनकर, जानकर दिग्भ्रमित भी हो जाता है। किंतु यदि वह अपनी बुद्धि कर्मयोग में स्थिर करता है और अब तक बताए गये मार्ग पर चलता है तो उसकी बुद्धि का भ्रम दूर होता है जैसा कि पूर्व की चर्चा से स्पष्ट हो जाता है। जब बुद्धि का भ्रम छँट जाता है तो उसे पता चलता है कि उसका सेल्फ/स्व/उसकी आत्मा क्या है, उसे ज्ञात होता है कि वह वास्तव में कौन है। उसे समझ में आ जाता है कि वह देह नहीं है, दिमाग भी नहीं है, किसी कुल का प्रतिनिधि भी नहीं है , किसी जाति और धर्म का सदस्य नहीं है, कोई पेशेवर नहीं है बल्कि वह तो विशुद्ध आत्मा यानी परमात्मा स्वरूप ही है। ये बात पढ़कर, रट कर समझने की बात नहीं है बल्कि कर्मयोग के रास्ते चलकर अनुभूत करने वाला ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद इस व्यक्ति की बुद्धि संसार से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है यानी व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा का संयोग हो जाता है। यही अवस्था योग की है। उसी अवस्था में व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म भी करता है जिसका एकमात्र उद्देश्य जनकल्याण ही होता है क्योंकि ईश्वर जन जन में होता है। यह बात वह व्यक्ति पढ़कर , रट कर नहीं बल्कि अनुभूति कर समझता है। 

       इसकी प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है। इसे निम्न चरणों में सरलता से समझा जा सकता है।

(1) व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होता है। जिज्ञासा की हद तो देखिए, दूध पीता शिशु भी चाँद और तारों की जिद्द करता है। आप खुद देख लें कि व्यक्ति अपने शैशव अवस्था से ही कितना कुछ जानने के लिए विकल रहता है।

(2) अब समझने वाली बात है कि सत्य तो एक ही होता है, बाकी सब असत्य ही होते हैं। हर व्यक्ति इस सत्य को पकड़ने और जानने के लिए प्रश्नवाचक मानसिकता/बौद्धिकता लिए अपनी समझ के अनुसार सत्य खोजते रहता है। 

(3) व्यक्ति की जिज्ञासा उसे तरह तरह के ज्ञान और अनुभव से रु ब रु कराती है। लेकिन होता ये है कि सत्य पाने की जगह वह इन भाँति भाँति के ज्ञान और अनुभव के चक्कर में पड़कर भ्रम और आज्ञान का शिकार हो जाता है। इस अवस्था में उसकी भ्रमित बुद्धि उसे एकलौते सत्य से दूर लेकर चली जाती है। आज भी आप सामाजिक विज्ञान पढिये या दर्शन या भौतिकी, रसायन या जीवशास्त्र, आप हम सब अंतिम सत्य की खोज में लगे होते हैं लेकिन ज्ञान के नाम पर अज्ञानता के कचड़े में फंस जाने की वजग से सत्य तक नहीं पहुँच पाते। 

(4) अज्ञानता के मकड़जाल में फड़फड़ाते हम सब तो अर्जुन हीं है न! श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि इतने अज्ञानता से पार पाना है तो हमें कर्मयोग की बुद्धि पर भरोसा करना होगा जो अपने तकनीक से हमारी बुद्धि के भ्रम और भ्रम की जननी माया को समाप्त कर देता है। तब हम सत्य को देख पाते हैं। तब हमारी जिज्ञासाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि तब हमें अपने प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर मिलने लगते हैं।

(5) जिज्ञासा के शांत होने से बुद्धि भी शान्त होती है, प्रश्न करने की ललक कम होती है क्योंकि तब एक एक कर हमारे प्रश्न खत्म होते जाते हैं , उनके उत्तर मिल जाते हैं।

(6) इस प्रकार से शांत चित्त की अवस्था में हमें वैराग्य का ज्ञान होता है और हम अपने स्व को समझने की योग्यता पाते हैं।

(7) अब स्व को समझ कर हम जीवन का समाधान कर सकते हैं यानी समाधिस्थ हो जाते हैं।

(8) समाधि की इस अवस्था में हम जान पा लेते हैं कि हम किस तरह से परमात्मा के ही अंश हैं, हमारी आत्मा परमात्मा के साथ संयोग कर लेती है। 

(9) ये वो अवस्था है जब हमारे सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हो जाते हैं । इस अवस्था में हम न केवल अपने अंदर को खोज पाते हैं बल्कि बाहरी संसार के रहस्यों को भी सहजता से समझ सकते हैं।

(10)  ये अवस्था कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा है।

       आगे श्रीकृष्ण इसी  तरह से कर्मयोग के सैद्धान्तिक पहलुओं और इसके क्रियात्मकता को और भी स्पष्ट करते हैं, जिसके लिए हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा।""

इस उद्धरण को देने के पीछे उद्देश्य यह है कि हम श्रीकृष्ण की उस शिक्षा का पुनः स्मरण कर सकें जिससे यज्ञ का अर्थ स्पष्ट होता है। वस्तुतः जब हम पूर्ण समर्पण के साथ उच्च आदर्शों को समर्पित हो कर बिना परिणाम से जुड़े स्वधर्म के अनुसार कर्म करते हैं तो यही यज्ञ है जिसे करने से हम कर्मबन्धन में बंधते नहीं हैं और कर्म भी करते हैं।
        अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि के पृष्ठभूमि में समझाते हैं कि ये यज्ञ भावना सृष्टि के प्रारम्भ से व्यक्तियों के साथ है और यदि मनुष्य इस यज्ञ भावना से काम करता है तो उसे हर इक्षित वस्तु प्राप्त होती है।  ये यज्ञ भावना वही है जो हम कर्मयोग की बुद्धि में सीखे हैं जो द्वितीय अध्याय में वर्णित है और जिसका एक अंश ऊपर भी दिया गया है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस सृष्टि में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। जब हम निःस्वार्थ भाव से अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण समर्पण के साथ करते हैं तो इससे पूरी व्यवस्था को लाभ होता है और वही व्यवस्था हमारी आवश्यकताओं का भी ख्याल रखती है। यदि इस व्यवस्था में कोई एक यूनिट स्वार्थवश होकर कार्य करने लगता है तो संतुलन गड़बड़ा जाता है। हम इसे सबसे बेहतर ढंग से खुद के शरीर के कार्यप्रणाली से समझ सकते हैं। हम जो खाना खाते हैं वह मुँह होते हुए पांचन तंत्र से होता हुआ सभी कोशिकाओं को उनके आवश्यकता के अनुसार पोषण देता है। यदि किसी अंग को ज्यादा या किसी विशेष पोषण की आवश्यकता होती है तो उसे वह प्रदान किया जाता है। सभी कोशिकाएँ  पूरे शारीरिक तंत्र के लिए कार्य करती हैं। यदि शरीर के किसी एक भाग की कार्यप्रणाली गड़बड़ाती है तो पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता है लेकिन यदि सभी कोशिकाएँ अपने निर्धारित कार्य को करती है तो शरीर भी स्वस्थ रहता है और बदले में कोशिकाएँ और सभी अंग भी स्वस्थ रहते हैं। आधुनिक ज्ञान में इसे ही TEAM WORK,  COOPERATIVE, SYNERGY आदि नामों से पुकारा जाता है। यज्ञ की भावना का सार है कि

ONE FOR ALL & ALL FOR ONE. जब हम इस भावना से कार्य करते हैं तो स्वस्थ समाज की रचना होती है, जिस समाज की समृद्धि से हम सभी लाभान्वित होते हैं।




                      



















     

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