श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 10

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
 अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌॥

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।।10।।

अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि के पृष्ठभूमि में समझाते हैं कि ये यज्ञ भावना सृष्टि के प्रारम्भ से व्यक्तियों के साथ है और यदि मनुष्य इस यज्ञ भावना से काम करता है तो उसे हर इक्षित वस्तु प्राप्त होती है।  ये यज्ञ भावना वही है जो हम कर्मयोग की बुद्धि में सीखे हैं जो द्वितीय अध्याय में वर्णित है और जिसका एक अंश ऊपर भी दिया गया है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस सृष्टि में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। जब हम निःस्वार्थ भाव से अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण समर्पण के साथ करते हैं तो इससे पूरी व्यवस्था को लाभ होता है और वही व्यवस्था हमारी आवश्यकताओं का भी ख्याल रखती है। यदि इस व्यवस्था में कोई एक यूनिट स्वार्थवश होकर कार्य करने लगता है तो संतुलन गड़बड़ा जाता है। हम इसे सबसे बेहतर ढंग से खुद के शरीर के कार्यप्रणाली से समझ सकते हैं। हम जो खाना खाते हैं वह मुँह होते हुए पांचन तंत्र से होता हुआ सभी कोशिकाओं को उनके आवश्यकता के अनुसार पोषण देता है। यदि किसी अंग को ज्यादा या किसी विशेष पोषण की आवश्यकता होती है तो उसे वह प्रदान किया जाता है। सभी कोशिकाएँ  पूरे शारीरिक तंत्र के लिए कार्य करती हैं। यदि शरीर के किसी एक भाग की कार्यप्रणाली गड़बड़ाती है तो पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता है लेकिन यदि सभी कोशिकाएँ अपने निर्धारित कार्य को करती है तो शरीर भी स्वस्थ रहता है और बदले में कोशिकाएँ और सभी अंग भी स्वस्थ रहते हैं। आधुनिक ज्ञान में इसे ही TEAM WORK,  COOPERATIVE, SYNERGY आदि नामों से पुकारा जाता है। यज्ञ की भावना का सार है कि
ONE FOR ALL & ALL FOR ONE. जब हम इस भावना से कार्य करते हैं तो स्वस्थ समाज की रचना होती है, जिस समाज की समृद्धि से हम सभी लाभान्वित होते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय