श्रीमदमागवादगीता अध्ययय 18 श्लोक 65
श्रीमदमागवादगीता अध्ययय 18 श्लोक 65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 65।।
हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है।
जब व्यक्ति कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग को एक साथ अनुसरण करता हुआ कर्मों में प्रवृत्त जीवन व्यतीत करता है तो उस परिणामतः वह कर्मों को करता हुआ भी कर्म और उनके फल को ईश्वर का अनुग्रह ही समझता है और उन्हीं पर आश्रित हुआ कर्मों को करता है। इसका व्यवहारिक प्रदर्शन होता है कि
1.व्यक्ति ईश्वर में ही अपने चित्त को लगाए अपने सभी कर्मों को करे। प्रत्येक कर्म और उसके परिणाम को मात्र ईश्वर का अनुग्रह ही माने।
2. व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ ईश्वर के प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रेम को व्यक्त करती रहें।
3. वह ईश्वर को ही साक्षी समझ कर अपने कर्म करे।
4. वह अपने हर कर्म के साथ ही ईश्वर के प्रति अपने अनुग्रह को व्यक्त करते रहे।
ऐसा करने वाला ही ईश्वर के साथ एकाकार होने में सक्षम होता है।
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