श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14

परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता की रचना अर्जुन के संशय को दूर करने के क्रम में हुई है। युद्ध क्षेत्र में युद्ध के लिए खड़े अर्जुन के मन में  युद्ध को लेकर कई प्रश्न उठने लगे थे और उसे युद्ध की निरर्थकता का भान हो रहा था, किन्तु युद्ध की निरर्थकता के लिए उसके जो तर्क थे वे युद्ध से कम और खुद उसके अपने संशय की वजह से अधिक थे। अर्जुन धर्म के विरुद्ध किसी भी आचरण को गलत मानता था और उसे संशय था कि यह युद्ध अर्जुन के लिए अधर्म का मार्ग खोलता है। उसके इसी संशय को दूर करने के लिए अर्जुन और कृष्ण के बीच जो सम्वाद हुआ वही श्रीमद्भागवद्गीता का रूप लेकर सामने आया। वस्तुतः कर्मक्षेत्र में हम सभी कई तरह की भ्रांतियों के शिकार होते हैं। ये भाँतियाँ इस  लिए हावी हो पाती हैं क्योंकि हम स्वयं के अस्तित्व को और स्वयं के साथ संसार के सम्बन्धों की बारीकियों को नहीं समझ पाते हैं। हम कौन हैं और इस संसार में हमारी भूमिका क्या है और क्यों है अगर हम यह समझ लें तो कोई भ्रम न रहे। किन्तु हम समझें कैसे कि हम कौन हैं, क्यों हैं? इसके लिए श्रीमद्भागवद्गीता में जो मार्ग सुझाया गया वह है ध्यान का मार्ग। लेकिन इस मार्ग तक कोई पँहुचे तो कैसे पहुँचे? तो इसके लिए कर्म, ज्ञान, भक्ति का रास्ता सुझाया गया जिससे यह ज्ञात होता है कि व्यक्ति के रूप में हम प्रकृति से भिन्न हैं लेकिन प्रकृति से हमारे संयोग के कारण हम संसार के व्यवहार में उतरते हैं। अगर हम अपने और प्रकृति के सम्बंध को समझ सकें तो फिर हमारा संशय दूर हो जाये। 
       13वें अध्याय तक श्रीकृष्ण इस अंतर को स्पष्ट कर चुके हैं किंतु अर्जुन का संशय बना हुआ है। सो एक बार फिर से इस सम्बंध में एक नई दृष्टि के साथ व्यक्ति के स्व को स्पष्ट किया गया है चौदहवें अध्याय में।

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