श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 64

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 64

सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌॥ 64।।

संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा

मोह क्यों होता है, मोह उतपन्न होने पर व्यक्ति के अंदर किस प्रकार की भावनाएँ आती हैं, उससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता कैसे प्रभावित होती है और उसका निराकरण कैसे किया जाता है और जीवन का परम लक्ष्य क्या है इसे पूरी तरह समझा चुकने के बाद अब बारी आती है उन अति महत्वपूर्ण मर्म बातों को समझने की जिससे हमारा भला होता है। सारी बातों का निचोड़ क्या है अगर हम इस पर ध्याय केंद्रित कर पाएं तो हमारी समझ पूरी होती है। इन्हीं मर्म को समझने के लिए अति संक्षेप में हम निचोड़ को समझते हैं अब।

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