श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 63

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ 63।।

इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर।

सँसार में जीवन जीने की कला ही श्रीमदमागवादगीता की शिक्षा है।  और इस शिक्षा का व्यवहार में अनुसरण कर हम जीवन में उस परम सुख और शांति को प्राप्त करते हैं जिसके लिए हम सब लालियत रहा करते हैं।
    यह ज्ञान अति गुप्त कहा गया है। दरअसल महाभारत की कहानी में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह ज्ञान दे रहें हैं उसका मोह छिन्न भिन्न करने के लिए। यह गान लगता है कि अर्जुन से बाहर  खड़े श्रीकृष्ण दे रहें हैं लेकिन सत्य तो यह है कि यह ज्ञान अर्जुन के भीतर, हम सब के भीतर पूर्व से मौजूद है। लेकिन अपने हठ, अपने अहंकार में हम उसे देख समझ नहीं पाते हैं। लेकिन जब हम यह ज्ञान सुनते हैं, जमते हैं तो हमें ध्यान आता है कि यह हमारे भीतर पहले से मौजूद है। 
      जब गीता की समझदारी देना श्रीकृष्ण शुरू करते हैं उसके पूर्व अर्जुन मोहित होकर हताश हुए रहते हैं और श्रीकृष्ण की शरण में जाते हैं। उस समय श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि जो इक्षा हो सो करो। उस समय तो श्रीकृष्ण अनुरागपूर्वक अर्जुन को समझदारी और ज्ञान की बातें कहते हैं। और जब कह लेते हैं तब कहते हैं कि इसपर विचार मंथन करो और फिर जो चाहते हो वह करो। श्रीकृष्ण यह क्यों नहीं कहते हैं कि मेरी बातों का अनुसरण करो?
   दरअसल जब अर्जुन प्रारम्भ में अपना मोह व्यक्त करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन को उस समय अपनी अवस्था, अपने ज्ञान, अपने कर्तव्य आदि के प्रति भ्रम उतपन्न हो चुका है। भ्रम में पड़े व्यक्ति से स्वतः निर्णय लेने के लिए कहना कदापि उचित नहीं होता है क्योंकि उस समय वह व्यक्ति स्थिर चित्त से कोई निर्णय लेने में सक्षम ही नहीं होता है। परंतु जब उसी व्यक्ति को उसकी स्थिति, उसके कर्तव्य आदि की जानकारी हो जाती है तब वह निर्णय ले सकता है। 
     इसी लिए कर्म, भक्ति, ज्ञान और ध्यान तथा जीवन के अंतिम लक्ष्य की चर्चा कर देने के पश्चात ही श्रीकृष्ण अर्जुन से स्वयं निर्णय लेने की सलाह देते हैं।

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