श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 60
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥ 60।।
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा।
व्यक्ति अपने स्वभाव से बन्धा होता है, उसी के अधीन होता है। सो व्यक्ति को चाहिये कि वह गूढ़ता से अपने स्वभाव को समझे और उसका विरोध नहीं करे बल्कि उसी को परिष्कृत कर उत्थान की तरफ बढ़े। यदि स्वभाब के विपरीत जाते हैं तो सारी ऊर्जा निष्फल जाती है । मन विचलित रहता है। लेकिन स्वभाब की अच्छाई और कमियों को समझ कर उसमें लगे रहकर उसीमें आवश्यकता अनुसार परिष्करण करते हैं तो सिद्धि का मार्ग खुलता है। दूसरे की नकल करने से पतन ही होता है। शेर लोमड़ी की तरह और लोमड़ी शेर की तरह व्यवहार करने की कोशिश करे तो दोनों असफल हो जाते हैं। स्वभाव को पहचान लेने से अपने कर्मों को करने का सही तरीका भी हमें मिलता है।
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