श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 58
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ 58।।
उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा।
संसार में रहकर कर्म करना अनिवार्य है। और जीवन पर्यन्त व्यक्ति को कर्म करना ही होता है। व्यक्ति सांसारिक जीवन के लिए चाहे जो भी कर्म करता हो उसके करने का रास्ता यही वो मार्ग है जिसे हमने अब तक के विवेचना में समझा है। यदि इस मार्ग पर हम चलते हैं तो हमारे जीवन में आ सकने वाली सारी कठिनाइयाँ दूर होती जाती हैं।
लेकिन यदि अहंकार वश हम इस सुझाव को नहीं मानते हैं और संसार के मोह बन्धन में बंधकर कर्म करते हैं तो फिर तय है कि हम चाहे जो सांसारिक उपलब्धि हासिल करते हों हम विफल हो कर रह जाते हैं।
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