श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 56, 57
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 56 57
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ 56।।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥ 57।।
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।
सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो
परम् गति मोक्ष को कहते हैं और मोक्ष वह अवस्था है जब कर्म के बंधन से मुक्ति मिल जाता है। तो क्या मोक्ष प्राप्ति के बाद कर्म नहीं करना होता है? नहीं ये तात्पर्य नहीं है। जीवन पर्यंत कर्म तो करना ही है लेकिन मोक्ष के पूर्व हमारे कर्म गुणों से प्रभावित होते हैं और उस अवस्था में हम कर्म करते हुए कर्म के बन्धन से बंधे होते हैं। लेकिन परम् सिद्धि की अवस्था आते ही हमारे कर्म हमारे गुणों से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं और फिर हमारे कर्म हमें बाँधते नहीं है।
लेकिन इस अवस्था तक पहुँचते कैसे हैं? हमने देखा है कि कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग्ग और ध्यानयोग के मार्ग से चलकर व्यक्ति परम् नैष्कर्म्य की मोक्ष की स्थिति को प्राप्त होता है। इस मार्ग के व्यवहारिक पक्ष को भी हमने समझा है जिसके अनुसार व्यक्ति को प्रारम्भ कर्मयोग से करना होता है जिसके अवयव हैं
अपने स्वभाव /अपनी स्थिति के अनुसार कर्म करना।
कर्म करने में कर्म के कारण से स्वयं को असम्बद्ध रहना।
कर्म के परिणाम से स्वयं को असम्बद्ध रखना।
कर्म को ईश्वर यानी उच्चतम स्तर के सत्य के प्रति समर्पित होकर करना।
कर्म के उपरांत प्राप्त फल को प्रसाद सदृश्य ग्रहण करना।
कर्मयोग बीज है जिससे मोक्ष का फल मिलना ही है। जब हम अपने समस्त कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित कर मात्र कर्तव्य वश कर्म करने लगते हैं तो कर्म के कारण, कर्म के परिणाम, सभी से मुक्त हो जाते हैं। तब हम में कर्म करने का कर्ता भाव भी नहीं रहता है और न कर्म करने के पीछे हमारे कोई गुण ही सक्रिय होते हैं। इस स्थिति में कर्म में ही भक्ति जागृत हो जाती है और स्वयं में, कर्म में और कर्मो के परम उद्देश्य यानी ईश्वर में भी कोई भेद नहीं करते और हमारे सभी कर्म मात्र दैवी कर्म ही रह जाते हैं। इस कर्मयोग में व्यक्ति को कोई विशेष कर्म नहीं करना है बल्कि सभी कर्म एक विशेष भाव यानी कर्मयोग के भाव से करना होता है जिसमें समस्त बुद्धि, विवेक, ज्ञान, भक्ति सभी कुछ सतत ही अपने लक्ष्य यानी परम् सत्य परमात्मा में लगा रहता है।
इसी स्थिति को मोक्ष कहते हैं जब कर्म तो होता है लेकिन सभी कर्म के निमित्त और उद्देश्य परम आत्म स्वरूप परमात्मा ही होते हैं। बाहर से तो यही लगता है कि यह व्यक्ति कर्म ही तो कर रहा है लेकिन कर्म करने वाले के लिए ये कर्म नहीं बल्कि अपने समस्त अस्तित्व का अपने परम सत्य को समर्पण मात्र ही होता है। इस स्थिति में व्यक्ति को उसका उद्देश्य यानी उसका आत्मस्वरूप परमसत्य ही उसे मार्ग भी दिखाता है और उसका स्वयं में वरण भी कर लेता है।
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