श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 50
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ 50।।
जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ।
कर्मयोग से कर्म करते हुए व्यक्ति का मन स्वक्ष होते जाता है। मन की स्वक्षता का अर्थ है कि उसे राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, काम, क्रोध, लोभ मद ,अज्ञानता, आदि से मुक्ति। इस अवस्था में जब मन आ जाता है तो उसे शुद्ध और स्वक्ष मन की अवस्था कहते हैं। मन की इस अवस्था में मन सदा प्रसन्न और सुखी रहता है, उसकी प्रसन्नता और उसके सुख के लिए कोई पूर्व शर्त नहीं होती है।
वस्तुतः व्यक्ति स्वयं ही ब्रह्म है लेकिन वह स्वयं ही इस सत्य से अनजान होता है और ईश्वर की प्राप्ति, स्थाई शांति और सुख की प्राप्ति के लिए बाहरी अवयवो को खोजते रहता है। जो आपके अंदर है वह भला बाहर कंहा मिलेगा, सो उसके सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं।
लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के अनुसार कर्म करने में दक्षता प्राप्त कर लेता है, कर्मयोग उसका स्वभाव बन जाता है तब उसके मन से विकार दूर हो जाते हैं। विकारों से स्वक्ष मन दर्पण की तरह होता है जिसमें वह स्वयं के वास्तविक स्वरूप यानी स्वयं को ब्रह्मयुक्त देख पाता है।
इस स्वयं को ब्रह्म समझने के लिए इस ज्ञान के प्रति विशेष निष्ठा की आवश्यकता होती है। कर्मयोग से स्वक्ष मन इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए निश्चित निष्ठा की प्राप्ति से मन स्वयं में अपना ईश्वरत्व प्राप्त कर पाता है।
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