श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 49

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 49

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥ 49।।

सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है।

व्यक्ति बिना कर्म किये तो रह नहीं सकता है तो फिर वह कौन सा मार्ग है, वह कौन सी समझ है जिसके अनुसार वह अपना स्वाभाविक कर्म करे कि कर्म करते हुए भी कर्म बन्धन में नहीं पड़े।
   तो इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपना स्वाभाविक कर्म तो करे किंतु उस कर्म और उसके फल से बंधे नहीं। यानी उसे कर्म सहज रूप में करने होते है और कर्म मैं कर रहा हूँ इस भाव से उसे मुक्त होना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कर्म  करते हुए भी कर्म करने में उसे स्वयं न दिखे बल्कि उसे लगे कि यही तो करना है। कर्म में मैं कर रहा हूँ और यह मेरा कर्म है इससे मुक्त हो। जैसे ही लगता है कि मैं ही कर रहा हूँ उसी समय उस कर्म के साथ व्यक्ति का मोह, लोभ, अहंकार, घृणा , वासना आदि जुड़ जाते हैं और वह कर्म फल से बन्धते जाता है और उसकी आसक्ति कर्म में बढ़ जाती है, सो वह कर्म बन्धन में बंध जाता है।
    और यह तभी सम्भव हो पाता है जब व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर , अपनी सोच पर पूरा नियंत्रण होता है और कर्म करने में उसे इसलिए रुचि नहीं होती है कि इससे उसकी कामनाएँ पूरी होंगी।
       और इस कर्म को करने में उसे कर्तापन का अहंकार नहीं होता है अर्थात वह कर्म तो करता है लेकिन कर्म करने वाला वह नहीं है बल्कि कर्म तो उसकी सहज वृत्ति है। अर्थात कर्म करने में कर्तापन का त्याग हो।
    इस समझ से अपना  सहज कर्म करने वाला ही कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त होता है।
     


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