श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 48
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ 48।।
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।
प्रत्येक व्यक्ति के कर्म उसके गुणों से आते हैं और यही तीनो गुणों से प्रकृति बनती है। जब तक व्यक्ति अपने स्वाभाविक प्रभावकारी गुणों में अभ्यास पूर्वक बदलाव नहीं लाता है तब तक उसके कर्म उसके तत्समय प्रभावी गुण के अनुसार ही होते हैं और इसी गुण के अनुसार किया जाने वाला कर्म व्यक्ति के द्वारा निपुणता और दक्षता के साथ किया जा सकता है। जो कर्म उसके सहज नहीं है उसमें उसकी निपुणता और दक्षता भी नहीं होती है या फिर निम्न कोटि की होती है और तब ऐसा कर्म किया जाए तो न तो कर्म ढंग से सम्पादित होगा और न हीं अभीष्ट की प्राप्ति ही होगी।
इसी लिए व्यक्ति को चाहिए कि सब अपना स्वाभाविक कर्म ही करे, नकल न करे किसी की।जब तक कोई अन्य गुण साधना से आत्मसात कर उसे अपने स्वभाव में नहीं ढाल लें तब तक कोई प्रयास न करें क्योंकि तब वह प्रयास नकल भर रहेगा और आपको अपने स्थान से गिरा देगा, आपके अपयश का कारण बनेगा और दूसरों के लिए समस्या बनेगा।
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