श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 47

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥ 47।।

अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।



व्यक्ति बिना कर्म किये तो रह नहीं सकता है और कर्म जब कर्मयोग के मार्ग से किया जाता है तो वही कर्म कर्मबन्धन से मुक्त हो पाता है। कर्मों को त्यागने से कोई किसी का कल्याण सम्भव ही नहीं है। कर्म को कर्मयोग से करने की एक अन्य विशेषता है कि व्यक्ति को उसी भाव से कर्म करना चाहिए जिस भाव से उसका स्वभाव निर्मित है। प्रत्येक व्यक्ति सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के भिन्न भिन्न मात्रा के अनुपात से उसका स्वभाव बनता है। जो गुण सबसे प्रभावी है स्वभाव में उसी के अनुसार कर्म करना चगये। प्रत्येक भाव से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव है जब उस भाव से कर्म किया जाए। यदि किसी व्यक्ति में क्षत्रिय का गुण सर्वाधिक है और वह ब्राह्मण के स्वभाव का कर्म करना चाहता है तो वह न अपने स्वाभाविक कर्म को कर पाता है और न वह ब्राह्मण की नकल ही कर पाता है। इस कारण उसे निरन्तर निराशा, क्षोभ जैसे नकारात्मक भावों से गुजरना पड़ता है। लेकिन व्यक्ति अपने स्वभाविक गुणों के अनुसार कर्म करता है और उसे सकारात्मक भाव से उस गुण की विशेषता के साथ कर्म करता है तो एक तरफ तो वह स्वयं को कर्तापन के अहंकार से मुक्त कर कर्म कर पाता है और दूसरी तरफ अपनी स्वाभाविक दक्षता की वजह से समस्त मानवता की यथोचित सेवा भी कर पाता है। अति सरल भाषा में समझें तो हम समझते हैं कि व्यक्ति को अपनी स्वाभाविक अभिरुचि के अनुसार उस अभिरुचि के लिए आवश्यक विशेषताओं को पूरा करते हुए ही कर्म करना चाहिए  तभी वह अपना शत प्रतिशत औचित्य सिद्ध कर पाता है।

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