श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 46
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 46।।
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
हर तरह के प्राणी को अपने स्वाभाव जनित कर्म ही करना चाहिए भले उसके सांसारिक कर्म कोई भी हों। लेकिन ये तो मात्र कर्म हुए । इन कर्मों को करें कैसे कि ये कर्म कर्मतोग के अनुसार हो पाएं? तो कर्मों को करने में कुछ बातों को ध्यान में रखना अनिवार्य हैं।
इस संसार की गति सर्वोच्च सत्य से ही निर्धारित होती है। सर्वोच्च सत्य ही विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे ईश्वर, भगवान, परमात्मा, आदि। यही हमारी परम् चेतना है। सभी कुछ इसे से उतपन्न होता है और अपने अंत में फिर उसी में समाहित हो जाता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। सागर की लहरें सागर के जल से निकलती हैं, उसी में उनका अस्तिव दिखता है और फिर उसी में वे विलीन हो जाती हैं। सागर की लहरों के लिए सागर का जल ही सर्वोच्च सत्य है। इसी प्रकार संसार के सारे सजीव और निर्जीव का परम सत्य एक हीं है और वही सभी में सामान भाव से उपस्थित भी है और सब कुछ अपनी उतपत्ति से अंत तक उसी के सहारे हैं।
सो व्यक्ति जब भी कर्म करे, जो भी कर्म करे उसे अपने कर्मों को उसी परम् सत्य को साक्षी समझ कर उसी को अर्पित कर करना चाहिए। इससे व्यक्ति का कर्ता भाव अभ्यासवश धीरे धीरे समाप्त हो जाता है और वह कर्म को प्रयास वश न कर स्वाभाविक गति से करने लगता है। जब वह इसका अभ्यास प्रारम्भ करता है तो उसे लगता है कि वह स्वयं उन कर्मों को कर रहा है। किंतु जब वह अपने कर्मों को ईश्वर पर समर्पित कर करने का बारम्बार अभ्यास करता है तो धीरे धीरे उसे अहसास होने लगता है कि यह तो ईश्वर की इक्षा से कर रहा है और उसी को समर्पित कर कर रहा है। इस कारण उसे शुद्ध ढंग से , शुद्ध भाव से बिना किसी फल के लालच के कर्म करने का अभ्यास होते जाता है। इस प्रकार से न केवल कर्मों के सफलता पूर्वक करने का अभ्यास होता है बल्कि वह त्रुटिपूर्ण, लालकग वश कर्म करने की प्रवृत्ति से बचता भी है और वही कर रहा है यह कर्ता भाव भी समाप्त हो जाता है। यही कर्तापन से मुक्ति उसे अहंकार मुक्त, लोभ मुक्त कर्म करने के लिए प्रेरित करता है जिस कारण वह सत्य और परम सिद्धि के मार्ग पर अग्रसर हो पाता है।
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