श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 43

श्रीमदमागवादगीता अद्याय 18 श्लोक 43

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥ 43।।

शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।

रजो गुण की अधिकता , और अल्प मात्रा में सत्वगुण और अत्यल्प मात्रा में तमोगुण धारी व्यक्ति स्वभाव से क्षत्रिय स्वभाव वाला  होता है। ऐसा व्यक्ति मुख्य रूप से क्षत्रिय होता है भले ही उसमे कुछ हद तक ब्राह्मण और बहुत कम तक बैश्य और शूद्र के भी लक्षण विद्यमान होते हैं। ऐसे क्षत्रिय स्वभाव वाले व्यक्ति के ज्ञान, बुद्धि और कर्म पूर्व पठित ज्ञान के अनुसार  निम्नवत कर्म होते हैं 



1. क्षत्रिय स्वभाव वाला व्यक्ति अपने स्वभाव से शूरवीर होता है अर्थात अपने समक्ष उपस्थित चुनौतियों और बदलाव का सामना करने के लिए ततपर रहता है न कि उनसे भागता है।यह गुण उसमें नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है।

2. ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव से ही ज्ञान की इक्षा रखने वाला होता है। ज्ञान और साहस मिलकर उसमें तेज प्रकट करते हैं जिसके कारण वह निडर होता है और चीजों के प्रति हमेशा सावधान रहता है।

3. क्षत्रिय स्वभाव युक्त व्यक्ति में कार्यों को सम्पन्न करने का दृढ़ संकल्प होता है और वह किसी भी स्थिति में अपने संकल्प से विचलित नहीं होता है।

4. अपने सम्मुख आये समस्या, चुनौती और परिवर्तन का सामना शांत चित्त से बिना भयभीत हए करने को ततपर रहता है।

5. अपने इन स्वभावों के कारण क्षत्रिय स्वभाव वाला व्यक्ति अति विपरीत और कठिन समय आने पर भी कभी भी पीठ नहीं दिखाता है बल्कि उनका सामना करता है।

6. इस तरह के व्यक्ति में स्वाभाविक विशेषता होती है कि जो कुछ उसके पास है, धन, ऐश्वर्य आदि उनको वह अन्य लोगों के साथ, विशेषकर जरूरतमंदों के साथ साझा करता है।

7.ऐसा व्यक्ति अधिकारी स्वभाव वाला होता है अर्थात परिस्थितियों के अधीन नहीं बल्कि परिस्थितियों का स्वामी बनकर , उनको नियंत्रित कर के रहना चाहता है।
   ये कुछेक मूल्य-कर्म हैं जो मुख्य रूप से क्षत्रिय स्वभाव वाले व्यक्ति के साथ होते हैं।

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