श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 42
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ 42।।
अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
वैसे तो किसी भी व्यक्ति में तीनों गुण यानी सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं लेकिन जब सत्वगुण सर्वाधिक होता है और रजोगुण उससे कम और तमोगुण अत्यल्प होता है तो उसे ब्राह्मण कहा जाता है। यह व्यक्ति भी तमोगुण और रजोगुण के प्रभाव से उतपन्न स्वभाव प्रदर्शित करता है किंतु उसका स्वभाविक आचरण सबसे अधिक प्रभावी सत्वगुण के अनुसार ही होता है।
अब देखते समझते हैं कि ब्राह्मण का कर्म सत्वविक वृत्ति के अनुसार कैसा होना चाहिए।
1.मन शांत और उद्वेगरहित होता है क्योंकि मन पर इंद्रियों का वश नहीं होता है बल्कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं।
2. जब इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं तो इस कारण इस व्यक्ति के मन में कोई नकारात्मक विचार नहीं उठते हैं।
3.यह व्यक्ति अपने इन्द्रिय जनित सम्वेदनाओं पर नियन्त्र रखता है सो इसकी प्रतिक्रिया भी संयमित ढंग से करता है और उन सम्वेदनाओं से प्रभावित भी नहीं होता है।
4. इस प्रकार के व्यक्ति के मन के अंदर और बाहर एक ही भाव होता है जिसमें नकारत्मकता का नितांत अभाव होता है सो यह व्यक्ति अंदर और बाहर एज समान पवित्रता पर केंद्रित होता है।
5. ऐसा व्यक्ति अपनी ऊर्जा को बेकार ही खर्च नहीं करता है बल्कि उनको संचित कर उच्च आदर्शों (उच्चतर लक्ष्य यानी परमात्मा) की प्राप्ति के लिए लगाता है।
6. ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव से ही क्षमाशील होता है।
7. ऐसे व्यक्ति के मन , बुद्धि, विवेक , ज्ञान और कर्म में समन्वय और तारतम्य होता है जिस कारण इस व्यक्ति का व्यवहार हमेशा ही सीधा, स्पष्ट और सरल होता है।
8. ऐसा व्यक्ति सिर्फ ज्ञान जानता ही नहीं है बल्कि हमेशा ज्ञान के मार्ग पर प्रवृत्त भी होता है जिस कारण उसका ज्ञान उसके व्यवहारिक अनुभवों में भी प्रकट होता है ।
9. इस व्यक्ति को हमेशा ज्ञात होता है कि वह तो एक छोटी इकाई भर है और दरअसल सर्वोच्च सत्य का एक अंश है सो वह परम सत्य की तरफ अग्रसर होता है।
फिर व्यक्ति चाहे जो कुछ हो लेकिन यदि उसके कर्म इन गुणों से संचालित होते हों तो वह व्यक्ति कर्म से ब्राह्मण कहलाता है।
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