श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 39
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥ 39।।
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।
अंग्रेजी में एक कहावत है ignorance is a bliss. जब व्यक्ति को ज्ञान, जानकारी, समझदारी और जागरूकता का अभाव होता है तो वह परम प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस अज्ञानता की वजह से वह भरम में रहता है, उसे पता ही नहीं कि सही क्या है, गलत क्या है, उचित और अनुचित क्या है, कौन सा कर्म वांछित है और कौन अवांछित है। उसकी स्मृति भी भ्रमित होती है। उसका मन मोह की अवस्था में पड़ा रहता है। यह अवस्था निंद्रा, आलस, प्रमाद की होती है जिसमें व्यक्ति स्वयं के प्रति, अपने कर्मों के प्रति, उनके परिणामों के प्रति किसी भी जागरूकता से रिक्त होता है। इस अवस्था में उसे जो सुख मिलता है वह तामसिक सुख कहलाता है। इस सुख का कारण अज्ञानता, जागरूकता का अभाव, मोह, भ्रम और भ्रांति होती है। इनके कारण व्यक्ति कर्म करते हुए भी और उनका परिणाम भोगते हुए भी मोह की अवस्था में पड़ा रहता है। सो वह विस्मृति की अवस्था में रहते हुए स्वयं को सुखी महसूस करता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति पुरुषार्थ कर्म में -अर्थात ज्ञान अर्जन, अर्थ अर्जन, दायित्वों के निर्वहन, और ध्यान में रहने की क्षमता से रहित होता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अक्षम होता है। उसे अपनी अक्षमता से ही सुख मिलता है।
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