श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 36-37

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 36-37

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ 36।।

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥ 37।।

हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है।

संसार को व्यक्ति अपने मन के भाव यानी अपने विचारों के अनुसार समझता है। व्यक्ति के समस्त कर्मो  का उद्देश्य सुख और शांति की प्राप्ति है सो जैसे  मन के विचार होते हैं उसे उसी के अनुसार सुख और शांति की प्राप्ति होती है। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि सुख और शांति की प्राप्ति हेतु व्यक्ति अपनी सोच को सही रास्ते पर रखे।
    लेकिन ऐसा सम्भव कैसे है? मन के भावों को और विचारों को दुखों की अनुभूति से दूर रखने के कई मार्ग हो सकते हैं लेकिन सर्वोत्तम मार्ग है दुख को समाप्त करना। दुख को सदा सदा के लिए समाप्त करना ही स्थाई सुख और स्थाई शांति का मार्ग है । दुख की अनुभूति भूत के प्रति मोह, भविष्य के प्रति आशंका और वर्तमान के प्रति उत्तेजना से होती है। मन के भाव और विचार बारम्बार अतीत और भविष्य में भागते हैं और वर्तमान में टिकते  भी हैं तो वर्तमान से उद्वेलित होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में मन काफी चंचल बना रहता है सो व्यक्ति को सुख का मार्ग नहीं मिलता है। ऐसा इसलिए हो पाता है क्योंकि हमें अपने कर्मों और कर्मफल से मोह के कारण लगाव बना रहता है। सो यदि दुख को सदा सदा के लिए समाप्त करना है तो स्वयं के अंदर की यात्रा करनी होगी न कि सुख के लिए बाहरी तत्वों पर निर्भर रहना होगा।मन अपनी स्थिति के अनुसार परिस्थितियों और चीजों का मूल्यांकन करता है और यह मन ऐसा मन में उठने वाले  विचारों  के कारण करता है। जब तक मन बाहरी तत्वों से प्रभावित होते रहता है यानी सम्बद्धता की स्थिति में रहता है तब तक मन उद्वेलित रहता है और इस कारण व्यक्ति अपने अंदर की यात्रा नहीं कर पाता है। सो मन को , उसके विचारों को भूत, भविष्य और वर्तमान से असम्बद्ध कर उसे शांत किये बिना स्थाई सुख और शांति नहीं मिल सकती है। ऐसा न तो पढ़कर किया जा सकता है और न सुनकर। मन को स्थाई रूप से दुखों से मुक्त करने लिए अभ्यास की आवश्यकता है। शुरू शुरू में यह प्रयास विषतुल्य लगता है लेकिन बारम्बार अभ्यास से मन स्वयं को बाहरी कारकों पर से अपनी निर्भरता को खत्म कर स्थाई सुख और शांति के अनुसार  निवास करता है।
    व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ सुख और शांति प्राप्त करने के लिए होती हैं। सो सुख को जानना समझना आवश्यक है। सुख भी तीन प्रकार के कहे जाते हैं, सात्विक, राजसी और तामसिक सुख।
      सात्विक सुख में दुखों का स्थायी रूप से अंत हो जाता है, राजस सुख में दुख से बाहरी चीजों से सम्पर्क कर कुछ समय के लिए स्वयं को अलग किया जाता है, जबकि तामसिक सुख की प्राप्ति के लिए दुख को निंद्रा आदि से दाबने, कुछ देर भूलने से होता है। इस प्रकार सात्विक सुख में दुख सदा के लिए समाप्त कर दिया जाता है । दुख उतपन्न करने वाले कारक रहते तो हैं लेकिन वे दुख नहीं दे पाते हैं।  जबकिं राजस  और तामस सुख की प्राप्ति दुखों को थोड़े समय के लिए भुला  कर या उनको दाब कर होता है।
     अब प्रश्न है कि सात्विक सुख कब और कैसे मिलता है। तो सात्विक सुख की प्राप्ति तब होती है जब व्यक्ति की बुद्धि अपने ही आत्मा में लगी रहती है, बाहरी कारकों में उसका मन नहीं भटकता है। जब उसकी बुद्धि, उसका मन चारो ओर से खींचकर उसके सेल्फ में ही अवस्थित होता है। तब न तो उसे सुख के लिए किसी बाहरी उत्प्रेरक पर निर्भर होना पड़ता है और न ही स्वयं को दुखों के कारणों से भुलाने की कोशिश करनी होती है।
    यह सब सम्भव कैसे होता है। तो सात्विक सुख यानी स्थाई सुख को प्राप्त करने क्रमिक मार्ग है, जो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग से होते हुए व्यक्ति को ध्यान तक ले जाता है जिसमें मन समस्त बाहरी भटकाव से मुक्त होकर आत्मवस्थित हुए रहता है। निश्चित ही इस मार्ग पर चलने पर प्रारम्भ में बहुत कष्ट हो रहा है ऐसा लगता है लेकिन बारम्बार अभ्यास से व्यक्ति कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान के माध्यम से असंबद्धता की स्थिति को पाता है जिसके बाद दुखों के स्थाई निवारण के कारण जो स्थाई सुख मिलता है वह अप्रतिम है।



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