श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 33।।

हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।) को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी।

कर्म को सफलतापूर्वक करने के लिए कर्ता को बुद्धि और ज्ञान का होना ही पर्याप्त नहीं होता है बल्कि उसके अंदर कर्म सम्पादन का दृढ़ निश्चय और धीरज भी होना अनिवार्य है। आपको पता है, आपको एक जगह पहुँचना है, आपको यह भी पता है कि जाने का मार्ग क्या है लेकिन इतने भर से आप अपने गंतव्य पर पहुँचते तो नहीं हैं। बल्कि आपको गंतव्य तक पहुँचने के लिए 
1.चलना होता है,
2.नियमित चलना होता है,
3.बिना दिग्भर्मित हुए चलना होता है, और
4.तब तक चलना होता है जब तक गंतव्य पर पंहुँच न जाएं।
       यही धृति है, धीरज है, धैर्य है। जब व्यक्ति अपनी सात्विकी बुद्धि और ज्ञान से अपनी स्थिति को समझकर कर्म करता है तो उसके लिए आवश्यक है कि
1.वह कर्म में प्रवृत्त रहे,
2. निर्धारित कर्म को नियमित करे,
3.कर्म करने से उसका ध्यान भटके नहीं, कई तरह के लाभ, लोभ, लालच, भय, क्रोध, घृणा, आदि नकारात्मक भाव से बचे रहकर अपने अंतिम लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न हो कर कर्म करे, और
4.जो कर्म करे उसके परम् लक्ष्य को प्राप्त करने के पूर्व रुके नहीं।
       जब व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त रहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि उसका लक्ष्य से ध्यान न भटके। ध्यान और एकाग्रता में फर्क है, उसे भी समझना चाहिए। एकाग्रता में व्यक्ति एक लक्ष्य पर ध्यान टिकाता है, उस लक्ष्य से जुड़े शेष तथ्यों से अनजान बना रहता है। लेकिन जब व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न होता है तो लक्ष्य के प्रति तो एकाग्र होता हीं है, उसके साथ साथ लक्ष्य के प्रति जागरूक भी रहता है, सो लक्ष्य से जुड़े, और उसको प्राप्त करने के मार्ग में किये जाने वाले कर्मो के प्रति भी और उनमें आ सकने वाली बाधाओं के प्रति भी जागरूक बना रहता है। सो व्यक्ति का कर्म अनवरत लक्ष्य की तरफ निर्बाध जारी रहता है। इस स्थिति में व्यक्ति मन, प्राण और इंद्रियों को अन्य विषयों में नहीं लगने देता है बल्कि उसकी चेतना की समष्ट चेष्टाएँ कर्म के प्रति ही समर्पित रहती हैं।
      यही धृति सात्विक धृति कही जाती है।


Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय