श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18-धृति के प्रकार(श्लोक 33 से 35 पर आधारित)
धृति के प्रकार
(श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33 से 35 के आधार पर)
कर्म को सफलतापूर्वक करने के लिए कर्ता को बुद्धि और ज्ञान का होना ही पर्याप्त नहीं होता है बल्कि उसके अंदर कर्म सम्पादन का दृढ़ निश्चय और धीरज भी होना अनिवार्य है। आपको पता है, आपको एक जगह पहुँचना है, आपको यह भी पता है कि जाने का मार्ग क्या है लेकिन इतने भर से आप अपने गंतव्य पर पहुँचते तो नहीं हैं। बल्कि आपको गंतव्य तक पहुँचने के लिए
1.चलना होता है,
2.नियमित चलना होता है,
3.बिना दिग्भर्मित हुए चलना होता है, और
4.तब तक चलना होता है जब तक गंतव्य पर पंहुँच न जाएं।
यही धृति है, धीरज है, धैर्य है। जब व्यक्ति अपनी सात्विकी बुद्धि और ज्ञान से अपनी स्थिति को समझकर कर्म करता है तो उसके लिए आवश्यक है कि
1.वह कर्म में प्रवृत्त रहे,
2. निर्धारित कर्म को नियमित करे,
3.कर्म करने से उसका ध्यान भटके नहीं, कई तरह के लाभ, लोभ, लालच, भय, क्रोध, घृणा, आदि नकारात्मक भाव से बचे रहकर अपने अंतिम लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न हो कर कर्म करे, और
4.जो कर्म करे उसके परम् लक्ष्य को प्राप्त करने के पूर्व रुके नहीं।
जब व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त रहता है तो उसके लिए आवश्यक है कि उसका लक्ष्य से ध्यान न भटके। ध्यान और एकाग्रता में फर्क है, उसे भी समझना चाहिए। एकाग्रता में व्यक्ति एक लक्ष्य पर ध्यान टिकाता है, उस लक्ष्य से जुड़े शेष तथ्यों से अनजान बना रहता है। लेकिन जब व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न होता है तो लक्ष्य के प्रति तो एकाग्र होता हीं है, उसके साथ साथ लक्ष्य के प्रति जागरूक भी रहता है, सो लक्ष्य से जुड़े, और उसको प्राप्त करने के मार्ग में किये जाने वाले कर्मो के प्रति भी और उनमें आ सकने वाली बाधाओं के प्रति भी जागरूक बना रहता है। सो व्यक्ति का कर्म अनवरत लक्ष्य की तरफ निर्बाध जारी रहता है। इस स्थिति में व्यक्ति मन, प्राण और इंद्रियों को अन्य विषयों में नहीं लगने देता है बल्कि उसकी चेतना की समष्ट चेष्टाएँ कर्म के प्रति ही समर्पित रहती हैं।
यही धृति सात्विक धृति कही जाती है।
कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनमें कर्मफल की प्राप्ति की इक्षा अति तीव्र होती है। ऐसे लोग वही कर्म करते हैं जिनसे उनको मनवांछित फल की प्राप्ति हो और इसलिए इक्षित फल की प्राप्ति के लिए ही उनकी धृति होती है। सो इस प्रकार के व्यक्ति फल और अर्थ( धन) में मन को लगाए कर्म करने वाले होते हैं और इक्षित फलों की प्राप्ति के लिए वे सांसारिक रूप से आवश्यक धर्म कर्म में प्रवृत्त होते हैं। ऐसी धृति या धैर्य धारण की वृत्ति को राजसी धृति कहा जाता है। लेकिन इस प्रकार की धृति सही और गलत पर आधारित न हो कर पसन्द और नापसन्द पर आधारित होती है और मात्र फल प्राप्ति की इक्षा से होती है जिसके कारण ऐसे व्यक्ति घोर कामी होते हैं और निरन्तर संसार के बंधन में बंधे होते हैं। ऐसे लोग बिना थके बराबर फल की प्राप्ति और धन कमाने में लगे रहते हैं। और इसके लिए लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, आदि भावों में डूबे हुए रहते हैं जिसके कारण वे निरन्तर कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं।
तामसी वृत्ति के व्यक्ति हमेशा काल्पनिक चीजों में उलझे रहते हैं और हमेशा सच्चाई से मुँह चुराते भागते रहते हैं। वे निरन्तर भय में जीते हैं, ऐसे भय में जिसका कोई कारण नहीं होता है, बल्कि जो उनकी कल्पना की उपज होता है। ये लोग धर्म कर्म भी न तो श्रद्धा से करते हैं और न लोभ से बल्कि वे यह भी भय से ग्रस्त होकर ही करते हैं। ये लोग बराबर दुख और विषाद में लगे रहते हैं, दुख और विषाद उनकी स्थाई प्रवृत्ति होती है। सो वे हमेशा इस भावना से ग्रस्त होते हैं कि उन्हींने कुछ खो दिया है और इसके दुख में ही लगे रहते हैं जिसके कारण अवसाद उनका स्थाई भाव बन जाता है। और ऐसे लोग अपने अहंकार में ही चूर रहते हैं और बारम्बार स्वयं को अवमानित महसूस करते हैं
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