श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 30
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 30
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 30।।
हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है।
सात्विक ज्ञान की समझ सात्विक बुद्धि ही कराती है जिसके कारण व्यक्ति सात्विक कर्म में प्रवृत्त होता है और सात्विक कर्ता कहलाता है। सात्विक बुद्धि के कुछ लक्षण निम्नवत हैं-
सन्सार में दो तरह के लोग होते हैं। एक जो सांसारिक कर्मो में लगे रहते हैं। ऐसे लोग सांसारिक जीवन में प्रवृत्त कहे जाते हैं। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो रहते तो संसार में ही हैं लेकिन वे सांसारिकता से बन्धते नहीं हैं। ऐसे लोग संसार से निवृत्त कहे जाते हैं।
संसार में रहकर व्यक्ति को कर्म तो करने ही होते हैं, लेकिन जब व्यक्ति की बुद्धि उसे संसार के मोह और बन्धन से मुक्त होकर कर्म करने के लिए प्रेरित करती है तो वह व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्म और कर्मफल से आसक्त नहीं होता है । इस प्रकार उसकी बुद्धि उसे हर सांसारिक कर्म बन्धन और कर्म के परिणाम से मुक्त करती है भले उस व्यक्ति के कर्म संसार से सम्बंधित क्यों न होते हों। जो बुद्धि कर्म से युक्त व्यक्ति को कर्म और कर्मफल से मुक्त रखती है वही सात्विक बुद्धि कही जाती है।
ऐसा व्यक्ति कैसे कर्म करता है? ऐसा कर्म करते हुए अपनी पसंद और नापसन्द के अनुसार नहीं करता है बल्कि उस कर्म के सही और गलत का भेद समझकर सही के लिए करता है। वह स्वधर्म से प्रेरित होता है। सो उसका कर्म लोक कल्याणार्थ होता है न कि अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए। प्रत्येक व्यक्ति का अपने , परिवार , समाज, देश, राष्ट्र, संसार, सजीव और निर्जीव के प्रति कुछ दायित्व होते हैं जिनके निर्वहन से वह सभी का कल्याण कर पाता है। यही कराने वाली बुद्धि सात्विक है। उसकी बुद्धि चूँकि स्वधर्मवश होकर रहती है सो उसे भी नही। होता है। उसके अंदर स्वार्थ पूर्ति की कामना नहीं होती है और न हीं कर्मफल के प्रति उसकी कोई लिप्सा होती है, सो ऐसा व्यक्ति निर्भय होता है। भय तो तब आता है जब कर्म करने के कोई विशेष फल की लालसा होती है जिसकी पूर्ति नहीं होने से उसे कुछ खोने का डर सताता है। लेकिन जब कर्म कर्तव्य वश किये जाते हैं, सिर्फ यह समझ कर किये जाते हैं कि उसकी स्थिति वशेष में वही कर्म श्रेयष्कर है सभी के लिए तो कर्म करने में व्यक्तिगत पसन्द और नापसन्द की बात ही खत्म हो जाती है। इसी कारण से व्यक्ति के अंदर कर्मफल के प्रति आसक्ति नहीं होती है बल्कि इस प्रकार से कर्म करने वाले को तो इसी से सुख और शांति मिलती है कि उससे जो कर्म हो रहें हैं वही उसकी स्थिति के अनुसार सबके कल्याणार्थ सही हैं। इसी कारण से ऐसी बुद्धि बन्धन से मुक्त करती है और मोक्ष दायिनी होती है। सो इस बुद्धि से युक्त व्यक्ति सभी सांसारिक कर्म करके भी संसार से निवृत्त होता है और मोक्ष गामी होता है।
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