श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥ 29।।

हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन।

प्रत्येक व्यक्ति बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति भावना व्यक्त करता है। इस भावना को समझ कर, उसकी जाँच पड़ताल कर उसपर अपनी समझ विकसित करता है  और इसप्रकार समझदारी प्राप्त करता है।
     बाहरी उत्प्रेरकों से मन में जो भावनाएँ उतपन्न होती हैं उनके प्रति जो समझदारी विकसित करता है वही बुद्धि है और जो समझदारी विकसित होती है वह ज्ञान है। इसप्रकार बुद्धि के अनुरूप  ही ज्ञान होता है। मान लीजिए कि किसी ने आपको गाली दी। गाली एक बाहरी उत्प्रेरक है । अब उस गाली के प्रति हमारी भावना में प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसक भाव आ सकता है अथवा क्षमा कर देने का भाव आ सकता है या फिर उसे नजरअंदाज करने का भी भाव आ सकता है। इन तीनों में हम कौन सा भाव अपनाते हैं यह हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है। और इस बुद्धि के अनुरूप हम जो निर्णय लेते हैं वही हमारे ज्ञान को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार बुद्धि मन और ज्ञान के बीच की कड़ी है। बुद्धि के कारण ही व्यक्ति चीजों में भेद कर उनके प्रकार और व्यवहार को समझता है। बुद्धि ही समझदारी की जननी है। बुद्धि व्यक्ति के मन को, उसके इंद्रियों को प्रभावित करती है , अपने अनुरूप बना लेती है सो बुद्धि से बाहर जाना सम्भव नहीं होता है। बुद्धि ही वह लगाम है जो मन को साध कर सही ज्ञान के रास्ते पर ले जाता है। यदि बुद्धि भ्रष्ट है तो मन पर लगाम कमजोर होगा और व्यक्ति का ज्ञान भी निम्न स्तर का होगा। नतीजा में उसके कर्म भी निम्न श्रेणी के होंगें और वह उसी के अनुरूप का कर्ता भी कहलायेगा।
       बुद्धि सही दिशा में हो तो ज्ञान की दिशा सही होगी और कर्म की भी। लेकिन बुद्धि हो जाने से कर्म होंगे ही या व्यक्ति कर्म करेगा ही कोई जरूरी नहीं है। सो एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है और वह है धृति या धैर्य (perserverance ) जिसके कारण व्यक्ति बुद्धि द्वारा निर्धारित मार्ग पर अंतिम तक चलने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध कर पाता है।
   इसके आलोक में बुद्धि और धृति के प्रकार को समझने की आवश्यकता है ताकि कर्म और कर्ता को और साफ ढंग से समझा जा सके।

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